DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

हिंदी पर हाय-तौबा

हिंदी के मुद्दे पर दक्षिणी प्रदेशों में उठे विरोध के स्वरों को दबाने के लिए केंद्र सरकार को जिस तरह राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे में संशोधन के लिए मजबूर होना पड़ा, उससे यह स्पष्ट है कि देश में शिक्षा की दिशा तय करना भी दबाव की राजनीति से मुक्त नहीं है। केंद्र सरकार को त्रिभाषा फॉर्मूले की सिफारिशों में संशोधन करना पड़ा। अपने देश में स्थानीय क्षत्रप स्वार्थवश कभी धर्म-जाति, कभी प्रांतवाद, तो कभी भाषा को लेकर जन-भावनाएं भड़काते हैं। हिंदी देश की 22 अधिकृत भाषाओं में एक है और अंग्रेजी के साथ सरकारी कामकाज की भाषा है। यह देश में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा भी है। ऐसे में, इस भाषा को लेकर पूर्वाग्रह रखना उचित नहीं।

युधिष्ठिर लाल कक्कड़, गुरुग्राम


पोस्टकार्ड जंग

लोकसभा चुनाव से ही पश्चिम बंगाल में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस एक-दूसरे पर निशाना साध रही हैं। बीजेपी के नेता और कार्यकर्ता जहां तृणमूल सुप्रीमो व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ‘जय श्रीराम’ लिखे 10 लाख पोस्टकार्ड भेज रहे हैं, तो वहीं तृणमूल कांग्रेस, भाजपा नेताओं को ‘जय बांग्ला, जय काली’ लिखे 20 लाख पोस्टकार्ड भेज रही है। इस सियासी कवायद में लगभग 30 लाख पोस्टकार्ड दोनों दल एक-दूसरे को भेजने वाले हैं। मगर इस लड़ाई में केंद्र सरकार को 3.53 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। यह पैसा देश के करदाताओं का है। दोनों दल जनता के पैसे से अपना सियासी हित साध रहे हैं। 2017 में आई डाक विभाग की एक रिपोर्ट बताती है कि एक पोस्टकार्ड पर सरकार की लागत 12.15 रुपये आती है, लेकिन जनहित में वह इसे 50 पैसे में बेचती है। यानी हर पोस्टकार्ड पर सरकार को 11.75 रुपये का घाटा उठाना पड़ता है। ऐसे में, ये दोनों दल आपस में लड़कर किसका हित कर रहे हैं?

प्रियंबदा, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश


रोजगार के बिना

वर्तमान समय में देश की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी है, जो साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। शिक्षित युवा भी नौकरी के लिए दर-दर भटक रहे हैं। अपनी कार्यक्षमता के अनुसार वे रोजगार पाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। योग्यता के मुताबिक वेतन नहीं मिलने से उनमें असंतोष पैदा हो रहा है। हालांकि कई कंपनियां भी योग्यता का सम्मान नहीं करतीं। शिक्षित लोगों को कम वेतन में काम करने को मजबूर किया जाता है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार को जल्द से जल्द ऐसी कोई योजना बनानी चाहिए कि हर हाथ को न्यायसंगत काम मिले, तभी भारत एक विकसित देश बन सकता है।

आशिष करोतिया, दिल्ली विश्व.


अपनी डफली अपना राग

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का महागठबंधन अब टूट गया है। मायावती अपने तर्क के आधार पर हार का ठीकरा अखिलेश यादव पर फोड़ चुकी हैं और उप-चुनाव में अकेले उतरने का फैसला किया है। बसपा उप-चुनाव में कितना करामात दिखा पाती है, यह तो नतीजों से पता चलेगा, लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों ने उत्तर प्रदेश के सारे समीकरण को उलट-पुलट दिया है। मामला इतना उलझा हुआ है कि अब भी नतीजों के विश्लेषण हो रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मजबूत जातीय समीकरण के बावजूद महागठबंधन फेल कैसे हो गया? किसके मतदाताओं ने किसको ठगा- मायावती के या अखिलेश यादव के? हालांकि 2014 के शून्य के मुकाबले 2019 में 10 सीटों पर जीतने वाली बसपा के आरोप का अखिलेश ने संयमित जवाब दिया है। इसमें अखिलेश यादव की परिपक्वता झलकती है। फिर भी यह सवाल तो बनता ही है कि क्या सच में ऐसा है? देखा जाए, तो एक गहन मंथन की आवश्यकता सपा और बसपा, दोनों को है।

सूर्यदीप कुशवाहा, वाराणसी
 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:mail box hindustan column on 10 june