DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

भविष्य का बजट

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले बजट में ऐसा कुछ प्रतीत नहीं होता कि मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग के लोगों को कुछ प्रत्यक्ष लाभ मिला हो। हालांकि सरकार पांच साल के लिए है, इसलिए बजट में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि अगले पांच वर्षों में भारत को विश्व पटल पर किस रूप में रखा जाएगा। बजट में जहां एक ओर वित्तीय संस्थानों की आर्थिक हालत सुधारने पर जोर है, तो वहीं अधिक से अधिक कंपनियों के खुलने के मार्ग को स्टार्टअप द्वारा सुगम बनाने का प्रावधान भी किया गया है। किसी भी देश की प्रगति उसकी आर्थिक और वित्तीय संस्थाओं की सेहत पर निर्भर करती है। बजट में इसके लिए भी भरसक प्रयत्न किए गए हैं। अधिक से अधिक लोगों को कर के दायरे में लाने और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की कोशिश भी की गई है। ऐसे में, भले ही मध्यम व निम्न वर्ग के लोगों को प्रत्यक्ष फायदा न हुआ हो, लेकिन इस व्यवस्था से उन्हें परोक्ष रूप से जरूर लाभ मिलेगा।

विमल शर्मा, नई दिल्ली


टूटती उम्मीदें

मंगलवार को प्रकाशित ‘समझदारी पर हावी सत्ता की भूख’ लेख पढ़ा। वाकई, कर्नाटक में विधानसभा चुनाव के बाद जनता दल (एस) और कांग्रेस की गठबंधन सरकार इसलिए बनी थी कि स्थानीय जनता की उम्मीदें पूरी की जा सकें। लेकिन ऐसा कुछ होने से पहले ही इस सरकार पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। इससे अब जनता को भी विश्वास हो चला है कि गठबंधन की सरकारों का वक्त पूरा होने को है, इसलिए चुनावों में अब किसी एक पार्टी को ही बहुमत देकर सत्ता सौंपनी चाहिए। कर्नाटक जैसी लंगड़ी सरकारें जनता के हित में ज्यादा तत्पर नहीं हो पातीं।

विजय कुमार धनिया, नई दिल्ली


अमेरिकी हित के खिलाफ 

अमेरिका की कुल आबादी 33 करोड़ के करीब है। इनमें से पांच करोड़ लोग विभिन्न देशों से आए आप्रवासी हैं। ऐसा नहीं है कि ये आप्रवासी वहां मुफ्त की रोटी तोड़ रहे हैं, बल्कि इनमें से अधिकांश कुशल कारीगर, तकनीशियन, शिक्षक, आईटी क्षेत्र में काम करने वाले लोग हैं। इनका वहां के विकास में अच्छा-खासा योगदान है। फिर भी पता नहीं क्यों, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 2020 में होने वाली जनगणना में नागरिकता के कॉलम को हटाने को तैयार नहीं थे, जबकि वहां की सर्वोच्च अदालत भी सरकारी तर्क को खारिज कर चुकी थी। साफ है, यह एक राष्ट्रवादी मानसिकता को आगे बढ़ाने की सोची-समझी साजिश थी। अमेरिकन फस्र्ट, मैक्सिको की सीमा पर दीवार, गोरे अमेरिकियों को तरजीह, चीन-रूस व ईरान से विवाद- ये सब धुर दक्षिणपंथी कदम हैं। यह अमेरिका के मूल निवासियों को आप्रवासियों से अलग करके उनका वोट अपने नाम करने का एक राजनीतिक हथकंडा है। सुखद है कि दबाव के बाद अब ट्रंप प्रशासन ने इससे पीछे हटने का फैसला लिया है।

जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर


बढ़ता आक्रोश 

पिछले कुछ बरसों से देश में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिसने सबको स्तब्ध कर दिया। कभी मॉब लिंचिंग, कभी चोरी के आरोप में पिटाई, तो कभी डायन के नाम पर मारपीट- मानो कानून हाथ में लेना सामान्य हो चला है। लेकिन क्या यह सिर्फ एक संयोग है या देश की उदासीन न्याय-व्यवस्था के कारण पनपा आक्रोश? कई मामलों में आरोपी आसानी से बरी हो जाता है, जिसके कारण लोग छोटे से छोटे अपराध में पकड़े गए आरोपी के खिलाफ भी कानून हाथ में लेने से परहेज नहीं करते। ऐसे में, जरूरी है कि अदालत के प्रति जनता में भरोसा कायम रहे, न्याय-व्यवस्था में सुधार हो और नियत समय के भीतर लोगों को न्याय मिले। अगर अब भी ऐसा नहीं किया जाएगा, तो हालात बेकाबू हो सकते हैं।

अक्षत शर्मा
मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश
 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:mail box hindustan column on 10 july