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बेमतलब की आशंका

 विभूति नारायण राय ने अपने लेख में थल सेनाध्यक्ष की इस स्वीकारोक्ति पर कि भारतीय सेना सीमा पार करके पाकिस्तानी सेना को दंडित कर रही है, अपनी असहमति व्यक्त की है। उन्होंने इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब होने की आशंका जताई है। मगर अब विश्व समुदाय जानता है कि पाकिस्तान आतंकवादी तत्वों को पनाह देता है, जिसका ताजा साक्ष्य अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को रोकी गई मदद है। यह भी गौरतलब है कि पाकिस्तान द्वारा भी संघर्ष-विराम का उल्लंघन करते हुए आतंकवादियों के लिए ‘कवर फार्यंरग’ की जाती है। लिहाजा हमें हालात की गंभीरता समझनी चाहिए। हमारे सेनाध्यक्ष कश्मीर क्षेत्र के बहुत अच्छे जानकार हैं। उनकी योग्यता पर हमें भरोसा करना चाहिए।
    नर सिंह, मेरठ


बोझ तले बचपन 
बच्चे देश का भविष्य होते हैं, पर वही बच्चे आज अपने स्कूली बस्ते के बोझ तले दबे हुए हैं। इसके कारण वे अपनी मासूमियत तो गंवा ही रहे हैं, खेल-कूद व अन्य क्रिया-कलापों से भी दूर होते जा रहे हैं। अच्छी बात है कि अब सरकार ने इस तरफ ध्यान दिया है और पाठ्यक्रमों में कुछ बदलाव करके बच्चों को राहत देने की सोची है। इसके लिए नेशनल कौंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च यानी एनसीईआरटी से कहा गया है कि वह वर्तमान पाठ्यक्रम का मूल्यांकन करके यह तय करे कि इसमें से क्या हटाया जा सकता है? बचपन पर बोझ कम होने से बच्चों के शारीरिक व मानसिक विकास में उल्लेखनीय प्रगति होगी।
    मोहम्मद आसिफ, लखनऊ

सरकार का दामन
बिनोवा भावे का कथन है, जिस राज्य में चरित्रहीनता विद्यमान हो, उस राज्य में कोई भी योजना काम नहीं कर सकती। इस पंक्ति की सार्थकता बिहार की वर्तमान स्थिति में उचित जान पड़ती है। सत्तासीन पार्टी का एक नेता नौ मासूम बच्चों को शराब के नशे में रौंदकर भाग गया। बच्चों का कुसूर बस इतना था कि वे अपने स्कूल से घर आने के क्रम में सड़क पार कर रहे थे। कथित रूप से जंगल राज से मुक्त बिहार के सत्तासीन महोदयों ने पहले तो यह मानने से ही इनकार कर दिया कि गाड़ी वह नेता चला रहे थे। यह तो चश्मदीदों की बहादुरी कहिए कि तमाम नोकझोंक के बाद आखिरकार उस व्यक्ति को समर्पण करना पड़ा। इस घटना का लब्बोलुआब यह है कि बिहार में या तो सरकार से जुड़े व्यक्ति के कृत्य को नजरअंदाज किया जाता है या फिर यह बताने की कोशिश की जाती है कि सरकार के रास्ते में जो आएगा, उसे कुचल दिया जाएगा। उक्त व्यक्ति द्वारा किया गया कृत्य तो अमानवीय है ही, पर उसे बचाने की कोशिश करना भी मानवीय हितों को कुचलना है। इससे राज्य सरकार को बचाना चाहिए था। 
    संजय कुमार

तमाशबीन दिल्ली
‘दिल्ली दिल वालों की’ पंक्ति हमने कई बार सुनी है, पर हाल-फिलहाल में दिल्ली वालों का रंग कितना बदल गया है, उसकी बानगी है अमरजीत के साथ प्रगति मैदान की घटी घटना। वह सीने पर चाकू का वार सहने के बाद तड़पते रहे और उनकी पत्नी दो पॉकेटमारों से घायल होने के बाद भी जूझती रहीं, मगर दिल्ली की दौड़ती जिंदगी में उन्हें बचाने के लिए कोई आगे नहीं आया। जब तक कुछ लोगों की मानवता जगती, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। दिल्ली घूमने निकले युगल जोड़ों में से एक दुनिया से जा चुका है। उम्मीदों के इस शहर में वे भी अपने सपनों को पूरा करने निकले थे, पर उन्हें नहीं मालूम था कि तमाशबीन दिल्ली में उनकी दुनिया उजड़ जाएगी। ऐसा नहीं है कि यह दिल्ली की पहली घटना हो, पर दिल्ली वालों ने अब तक कुछ नहीं सीखा है। वहीं सरकार भी वादा करने के बावजूद बसों में मार्शल तैनात नहीं कर सकी है। यह सरकार की उदासीनता और नाकामी है। 
    शैलेंद्र सिंह

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