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जीवन लीलता धूम्रपान

जीवन लीलता धूम्रपान
आज के दौर में धूम्रपान एक ज्वलंत समस्या है। दुखद है कि युवा सबसे ज्यादा इसके लती हैं। आंकड़े बताते हैं कि देश में लगभग 35 फीसदी वयस्क तंबाकू का सेवन करते हैं। यह स्वास्थ्य के लिहाज से निश्चय ही हानिकारक है। वैसे तो तंबाकू का किसी भी तरह से सेवन सेहत के साथ खिलवाड़ करना है, पर धूम्रपान कहीं ज्यादा नुकसान करता है। इससे हृदय रोग और फेफड़े का कैंसर आदि होेने की आशंका होती है। विडंबना यह है कि करीब 90 फीसदी लोग यह मानते हैं कि तंबाकू सेवन गलत है, फिर भी इसके लती अपनी आदत नहीं छुड़ा पाते। जबकि कहा यही जाता है कि अगर दृढ़ संकल्प ले लिया जाए, तो हम किसी भी बुरी आदत से छुटकारा पा सकते हैं। सरकार को जागरूकता की और ज्यादा पहल करनी चाहिए। -आदर्श त्रिपाठी, आवास विकास, कानपुर

बेअसर होती आरटीआई
कितनी अजीब बात है कि हर कोई जवाबदेही और पारदर्शिता की बातें तो करता है, लेकिन खुद इनसे बचने की कोशिश में रहता है। इसी के चलते सूचना का अधिकार कानून प्रभावी नहीं हो पा रहा है। ताजा मसला राजनीतिक दलों से जुड़ा है। सियासी दलों को यह शोभा नहीं देता कि वे सूचना का अधिकार कानून से बचने का जतन करें। एक ओर केंद्रीय सूचना आयोग स्पष्ट कर चुका है कि सभी राष्ट्रीय दल आरटीआई के तहत आते हैं, मगर चुनाव आयोग की एकराय से राजनीतिक दल उत्साहित हो रहे हैं। आयोग ने कहा है कि सूचना के अधिकार के दायरे से पार्टियां बाहर हैं। जाहिर है, इसकी आड़ में राजनीतिक दल अपनी आय-व्यय का ब्योरा सार्वजनिक करने से बचते रहेंगे। यह लोकतांत्रिक देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। -सत्य प्रकाश, लखीमपुर खीरी

बच्चों को प्रोत्साहन
बच्चों के परीक्षा परिणाम आने लगे हैं। ऐसे में, यह जरूरी है कि इस वक्त हम बच्चों को प्रोत्साहित करें और उनका मनोबल बनाए रखें। यह ऐसा समय होता है, जब बच्चों की मन:स्थिति बहुत ही नाजुक होती है। प्रतिस्पद्र्धा के इस युग में बच्चे ही नहीं, अध्यापक और माता-पिता की आशाएं भी बच्चों से जुड़ी होती हैं। इसलिए जरूरी है कि वे जितने भी अंक लेकर आएं, उसे उसकी मेहनत माना जाए और उसे कतई कमतर नहीं आंका जाए। बच्चों पर बेवजह का दवाब डालने से बचना चाहिए। दूसरों के रिजल्ट से तो बिल्कुल ही तुलना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे बच्चों की मनोदशा पर बुरा प्रभाव पड़ता है। उन्हें समझाना होगा कि यह जिंदगी का कोई आखिरी परिणाम नहीं है। इसमें कम अंक लाने वालों के लिए भी लक्ष्य तक पहुंचने के तमाम रास्ते खुले रहते हैं। ईमानदारी से मेहनत करने वालों के कदम को सफलता खुद आगे बढ़कर चूमती है। -शकुंतला महेश नेनावा, इंदौर, मध्य प्रदेश

आग का प्रकोप
हर साल अप्रैल-मई महीने के आते-आते उत्तराखंड के जंगल आग की चपेट में आ जाते हैं। इस वर्ष भी जंगलों की आग खबरों में हैं। फिर भी इसे रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। इस कारण उत्तराखंड की मूल वनस्पति को हम खोते जा रहे हैं और चीड़ के जंगल अत्यधिक फैलते जा रहे हैं। चीड़ के पेड़ों से पहाड़ों में पानी की कमी होती है व जल-स्रोत सूख जाते हैं। खेतों में नमी न होने से वे बंजर भी हो रहे हैं। नतीजतन पहाड़ों से पलायन भी तेज है। चीड़ और वहां की मूल वनस्पति एक साथ नहीं हो सकती है। इसके लिए चीड़ के पेड़ों को पहले खेतों के अगल-बगल से हटाना होगा, फिर जंगली पौधों के साथ-साथ बांज, बुरांश जैसे पेड़ लगाने होंगे। ऐसी योजना लानी ही होगी, ताकि लोग गांवों की तरफ प्रेरित हों और उत्तराखंड एक हरे-भरे प्रदेश के रूप में विकास के पथ पर आगे बढ़े। -कुम्मी मनराल, वैशाली

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  • Web Title:mail box column in hindustan on 31 May