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नोटबंदी की हकीकत

नोटबंदी की हकीकत
साल 2016 के नवंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक 500 और 1000 रुपये के नोट को बंद करने का एलान किया था और कहा था कि यह काले धन पर कड़ी चोट है। भारतीय जनता ने भी तमाम मुश्किलों को झेलते हुए इस फैसले का स्वागत किया। कई ने तो अपनी जान भी गंवाई। मगर हाल ही में आए आरबीआई के आंकड़े बताते हैं कि 99 फीसदी से अधिक 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट बैंक में वापस लौट चुके हैं, तो क्या एक प्रतिशत से भी कम काले धन के लिए पूरे देश को लाइन में खड़ा कर दिया गया था? नोटबंदी के दौरान जिन लोगों की मौत हुई, उनकी जिम्मेदारी कौन लेगा? जबकि विभिन्न बुद्धिजीवियों और अर्थशास्त्रियों ने सरकार को सचेत कर दिया था कि नोटबंदी से देश की अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान हो सकता है। रिजर्व बैंक की ताजा रिपोर्ट बताती है कि नोटबंदी पूरी तरह से विफल रही। सरकार को इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए। -मोहम्मद इरफान, वासेपुर, धनबाद

उचित टिप्पणी
विगत जनवरी में जब सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने प्रेसवार्ता करके न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाया था, तभी से सामान्य नागरिकों के मन में न्यायपालिका की इस शिखर संस्था के प्रति ऊहापोह के भाव उठने लगे थे। इसके बाद उच्च न्यायालय के कतिपय न्यायाधीशों की सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति के सवाल पर केंद्र सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम के बीच खींचतान के कारण यह भाव और गहरा हो गया। मगर महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव की जनवरी की घटना के संबंध में पुलिस द्वारा प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के विरुद्ध की गई कार्रवाई पर सर्वोच्च न्यायालय ने जैसी टिप्पणी की है, उससे सामान्य जनमानस में शीर्ष अदालत के प्रति विश्वास लौट आया है। सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी से कि प्रजातंत्र में भिन्न मत ‘सेफ्टी वॉल्व’ की तरह उपयोगी होता है, सत्ता-प्रतिष्ठान को सीख लेनी चाहिए। शीर्ष अदालत ने पहली बार किसी असंबद्ध पक्षकार की याचिका पर इन कार्यकर्ताओं को राहत दी है और साफ कर दिया है कि वही सही अर्थों में जनता के अधिकारों की रक्षक है। नर सिंह, मयूर विहार 1, मेरठ

नोटा का बेजा विरोध
‘नोटा : बौद्धिक विलासिता की उपज’ नहीं है, बल्कि सिद्धांतविहीन, चरित्रहीन, अवसरवादी राजनीति और नेता के खिलाफ जनतांत्रिक कर्तव्यों से जुडे़ मतदाता की नकारात्मक प्रतिक्रिया है। संसद और विधायिकाओं में प्रमुख राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के जन-प्रतिनिधि जिस तरह कॉरपोरेट, सामंती और अपराधियों की तिकड़ी के चंगुल में फंसे हुए हैं और राजनीतिक प्रतिबद्धता, वैचारिक निष्ठा से दूर हट रहे हैं, उसमें नोटा चुनाव में उतरे उम्मीदवारों की अप्रासंगिकता के प्रति नागरिक असंतोष का अनिवार्य ‘सेफ्टी वॉल्व’ का काम करता है। -शंकर प्रसाद यादव, समस्तीपुर, बिहार

जैव ईंधन है स्वच्छ 
अपनी आबोहवा को स्वच्छ बनाने की दिशा में भारत एक कदम और आगे बढ़ गया है। हमारे वैज्ञानिकों ने देश को विमानन क्षेत्र में विकसित देशों की कतार में ला खड़ा करने का सफल प्रयास किया है। ‘जफ्रोटा’ के बीज से निकले तेल से विमान उड़ाना कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। यह ईंधन औद्योगिक अनुसंधान परिषद और भारतीय पेट्रोलियम संस्थान के वैज्ञानिकों के संयुक्त प्रयास से तैयार हुआ है। इस ईंधन के इस्तेमाल से न सिर्फ आयात पर हमारी निर्भरता कम होगी, बल्कि हमारे किसानों के लिए आमदनी के नए रास्ते भी खुलेंगे। यात्रियों को सस्ती विमान सेवा के रूप में फायदा होगा। जरूरत है कि इस ईंधन का इस्तेमाल सड़क व रेल परिवहन में भी हो। इससे प्रदूषण-मुक्त भारत का सपना पूरा होगा। हमें अपने वैज्ञानिकों पर गर्व है। -निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

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  • Web Title:mail box column in hindustan on 31 august