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आसमान छूती महंगाई

आसमान छूती महंगाई
पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतें दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही हैं, और मोदी सरकार इसके लिए कुछ भी करती हुई नहीं दिख रही। क्या यही हैं अच्छे दिन? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 के चुनाव प्रचार में कहा था कि उनके सत्ता में आते ही देश में हर किसी के अच्छे दिन आ जाएंगे, लेकिन पेट्रो पदार्थों की कीमतों में निरंतर वृद्धि ने यह साबित कर दिया है कि मोदी सरकार भी महंगाई रोकने में नाकामयाब रही। डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है। ऐसे में, पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इतनी रफ्तार से वृद्धि कोई शुभ संकेत नहीं है, क्योंकि डीजल की कीमतों में वृद्धि के कारण रोजमर्रा में प्रयोग होने वाली चीजों की कीमतें भी बेहिसाब बढें़गी। इसलिए केंद्र सरकार को इनकी कीमतें थामने के लिए फौरन कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए। -राजेश कुमार चौहान, जालंधर

कानून से ऊपर कोई नहीं 
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि सभी राजनीतिक दल अपने-अपने सांसदों-विधायकों के आपराधिक रिकॉर्ड सार्वजनिक करें, ताकि मतदाता भी जान पाएं। किंतु सरकार कहती है कि कोर्ट को ऐसे मामले में दखल नहीं देना चाहिए। आखिर क्यों? एक तरफ तो खुद सरकार राजनीति से अपराधीकरण को समाप्त करना चाहती है, और दूसरी तरफ न्यायपालिका को दखल न देने की सीख देती है। आखिर सरकार चाहती क्या है? साथ ही अन्य राजनीतिक दल भी क्या चाहते हैं? क्या वे राजनीति में अपराधियों की संख्या बढ़ाना चाहते हैं? सरकार को इस मामले में बेवजह की दलील अदालत में नहीं पेश करनी चाहिए, जिससे किसी भी रूप में अपराधियों के हौसले बुलंद हों। बेहतर यही है कि कानून को अपना काम करने देना चाहिए और सरकार अपना काम करे। विधायिका और न्यायपालिका, दोनों को एक-दूसरे के काम में दखल देने से बचना चाहिए, ताकि दोनों की प्रतिष्ठा और विश्वास जनता के बीच बरकरार रह सके। हमारा संविधान साफ कहता कि देश के कानून से ऊपर न तो आम आदमी है और न ही कोई खास। - शकुंतला महेश नेनावा, इंदौर, मध्य प्रदेश

कहां है सरकार
बिहार के सहरसा से दिल दहला देने वाला एक वीडियो सामने आया है, जिसमें साफ-साफ देखा जा सकता है कि किस प्रकार कुछ लड़के स्कूल जा रही एक लड़की के साथ सरेआम छेड़छाड़ करते हैं। बिहार में सुशासन का क्या हाल है, इसका अंदाज लगाना अब मुश्किल नहीं है। वहां की गठबंधन सरकार में बीजेपी भी शामिल है, जिसका नारा है- ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’। क्या इसी तरह बेटियां बचेंगी और पढ़ेंगी? इस घोर अपराध के लिए जो भी लड़के जिम्मेदार हैं, उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए, ताकि ऐसी नीच हरकत करने से पहले कोई भी बिगड़ैल सौ बार सोचे। - प्रदीप कुमार तिवारी, ग्रेटर नोएडा, उत्तर प्रदेश

नोटा का महत्व 
हमारे देश में लोग मतदान में इसलिए रुचि नहीं लेते, क्योंकि चुनाव में देशहित या जनहित के लिए कम ही प्रत्याशी खड़े होते हैं, प्राय: पार्टी के हित के लिए चुनाव लडे़ जाते हैं। नेता चाहे आपराधिक पृष्ठभूमि का हो, जेल में हो या अयोग्य हो, यदि पार्टी को वह जीताऊ लगता है, तो उसे आसानी से टिकट मिल जाता है। ऐसा नेता भला देश या जनता का क्या हित करेगा? फिर नोटा के लिए कोई प्रभावशाली नियम भी नहीं है। नोटा के मतों को रद्द वोटों की श्रेणी में गिना जाता है। यदि नोटा के मतों की संख्या सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी के मतों से अधिक हो, तो उस क्षेत्र का चुनाव रद्द कर पुनर्मतदान कराया जाए। एक बार पैसा जरूर बरबाद होगा, परंतु फिर कोई पार्टी ऐसे व्यक्ति को टिकट नहीं दे पाएगी। तभी नोटा का प्रावधान भी सार्थक हो सकेगा। -राम नारायण, शालीमार बाग, दिल्ली 

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  • Web Title:mail box column in hindustan on 30 august