DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आपदा प्रबंधन का हाल 

आपदा प्रबंधन का हाल 
‘बाढ़ जिसमें आपदा प्रबंधन बह गया’ शीर्षक आलेख में एम सुधाकर रेड्डी ने स्पष्ट कहा है कि केरल की आपदा प्राकृतिक से ज्यादा मानव-जनित है। अगर आपदा प्रबंधन विभाग की पूर्व तैयारी पुख्ता होती, तो वहां आई बाढ़ की विभीषिका को काफी कम किया जा सकता था। यदि आपदा प्रबंधन विभाग अपनी तैयारियां हमेशा मुकम्मल रखे, तो जान-माल की व्यापक क्षति को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। इसका उदाहरण अक्तूबर 2013 में ओडिशा में आए फैलिन चक्रवाती तूफान में देखने को मिला था। किसी भी आपदा से निपटने के लिए स्थानीय लोगों को जागरूक करना काफी कारगर कदम साबित होता है। इसलिए बाढ़ग्रस्त या तूफान वाले तटीय इलाकों के लोगों को प्राथमिक स्तर पर प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। बचाव कार्यों में जुटे एनडीआरएफ के जवानों और अधिकारियों के अदम्य साहस का भी प्रचार-प्रसार होना चाहिए, ताकि उनका भी हौसला बढे़। -कुंदन कुमार, बीएचयू

राष्ट्रीय समस्या है जाम 
देश में कोई भी त्योहार हो, सड़कों पर जाम लगना तय है। दिल्ली से मेरठ का सफर जो बमुश्किल दो घंटे का है, त्योहारी दिनों में छह-सात घंटों का हो जाता है। आम तौर पर इसके लिए सभी लोग प्रशासन और पुलिस वालों को दोष देने लगते हैं। लेकिन क्या वास्तव में इसके लिए प्रशासन ही दोषी है? इस सबके लिए हम सब भी दोषी हैं। जरा सी जगह मिलते ही हम वाहनों की चार-चार लाइनें लगा देते हैं, जिससे सामने से आने वाला बीच में ही फंस जाता है और जाम की स्थिति बन जाती है। जाम की समस्या हमारे देश में एक लाइलाज समस्या जैसी बन चुकी है। इस समस्या का मुख्य कारण है वाहनों की दिनोंदिन बढ़ती संख्या। वाहन निर्माता कंपनियां नए-नए प्रलोभन देकर अपना टारगेट पूरा करने के लिए वाहनों की बिक्री बढ़ाती जा रही हैं और उधर बैंक एवं दूसरे वित्तीय संस्थान आसान किस्तों के जरिए लोगों को गाड़ी खरीदने के लिए उकसाते रहते हैं। ऐसे में, इस समस्या का केवल एक ही समाधान है कि बड़े वाहनों के प्रोडक्शन में कम से कम दस साल के लिए 80 प्रतिशत की कटौती की जाए और  साइकिल चलाने वालों को विशेष प्रोत्साहन दिए जाएं। इससे प्रदूषण से भी मुक्ति मिलेगी और देश को पेट्रो डॉलर भी कम खर्च करने पड़ेंगे। -अरविंद कुमार गर्ग, मेरठ 

दंगा बनाम दंगा
आजादी के समय से ही देश में दंगे होते रहे हैं, और इनमें शुरुआती एकाध दशक को छोड़ दें, तो बाद की सरकारों की भूमिका हमेशा ही संदिग्ध रही। सवाल यह है कि इस पर सियासत करने की बजाय इसके निराकरण का कोई ठोस रास्ता क्यों नहीं निकाला जाता? इसमें तो कोई दोराय नहीं हो सकती कि दंगों के शिकार सभी समुदाय के लोग यहां-वहां होते हैं, इसलिए ऐसी किसी वारदात में संदिग्धों के साथ स्थानीय पुलिस-प्रशासन के खिलाफ भी क्यों न आपराधिक मुकदमा चले? जब तक प्रशासन के लोगों को सजा नहीं होगी, दंगे कभी नहीं रुकेंगे। -अयोध्या राय, जनकपुरी वेस्ट, दिल्ली

तब क्यों चुप रहे राहुल
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने विदेशी धरती पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड जैसी कट्टरपंथी जमात से की है। हम सभी जानते हैं कि यूरोप का समाज काफी लोकतांत्रिक है। वहां पर अभिव्यक्ति की आजादी का भरपूर सम्मान किया जाता है। इसलिए राहुल के आरोपों को भी लोगों ने गंभीरता से लिया होगा। पर सवाल यह है कि जब उनकी पार्टी मानती है कि आरएसएस इतना खतरनाक संगठन है, तो फिर जब वह सरकार में थी, तब उसने आरएसएस पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया? इसलिए क्या उन्हें आरएसएस पर हमला करने में कुछ संयम नहीं बरतना चाहिए? -आकांक्षा सिंह, गुरु रामदास नगर, दिल्ली-92

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:mail box column in hindustan on 28 august