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सोच बदलें

सोच बदलें
सत्तर साल पहले आजादी मिलने के बाद भी हमारे देश में एक ऐसा वर्ग था, जो अपने हक के लिए काफी संघर्ष कर रहा था। उसे हम इंसान की श्रेणी में नहीं मानते थे। इसमें दोष सबसे ज्यादा हमारे समाज का है। लेकिन अब उसकी पहचान बदल गई है। आज ऐसा लग रहा है, मानो देश फिर से आजाद हुआ है। धारा 377 की वजह से हमारे यहां समलैंगिक रिश्ता अपराध माना जाता था। इस वर्ग को नौकरी, शिक्षण संस्थानों, समाज आदि में अलग नजरिये से देखा जाता था। इनके साथ भेदभाव किया जाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। अब जरूरत समाज की मानसिकता बदलने की है। समाज में समलैंगिकों के हित में जागरूकता फैलानी होगी। लोगों को समझाना होगा कि यह कोई बीमारी नहीं है। सबसे बड़ी बात, पुलिस भी अब बेवजह इन लोगों को परेशान नहीं कर सकेगी। -आशीष, आरएमएल कॉलेज, डीयू

नैतिकता की बहस
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में आपसी सहमति से दो वयस्कों के बीच बनाए गए संबंध को आपराधिक कृत्य से अलग (बाहर) कर दिया है। इस समाचार को सुनकर समलैंगिक बहुत खुश हैं। इसकी वजह भी है। एक तो उन्हें अपने अधिकार मिल गए, और फिर इस फैसले ने समाज में बरसों से चली आ रही नैतिकता बनाम समलैंगिकता की बहस को एक तरह से समाप्त कर दिया है। हमें समझना चाहिए कि समलैंगिकता का उल्लेख कई पुरानी पुस्तकों में भी मिलता है। जब यह सब कुछ पुराने समय से हमारे समाज में चला आ रहा है, तो इस पर विवाद खड़ा करने का भला क्या औचित्य था? सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला कई मामलों में नजीर है। लोगों ने इसे हाथों-हाथ लिया है। -नवीनचंद्र तिवारी, रोहिणी, दिल्ली

परिवहन व्यवस्था की खामी
गुरुवार को जयंतीलाल भंडारी का लेख ‘बढ़ती कारों का काफिला रोककर ही बढ़ेगी हमारी रफ्तार’ पढ़ा। इसमें उन्होंने देश में कारों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताते हुए निजी कारों का उपयोग करने वालों पर पश्चिमी देशों की तर्ज पर कंजेशन चार्ज लगाने की वकालत की है। यह सही है कि भारत में दिन-ब-दिन जाम और प्रदूषण की समस्या गहराती जा रही है, लेकिन निजी वाहनों पर अतिरिक्त शुल्क लगाना इसका समाधान नहीं है, बल्कि जरूरत है अपनी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को सर्वसुलभ और सुरक्षित बनाने की, ताकि अधिक से अधिक लोग इसका इस्तेमाल कर सकें। इससे न केवल निजी वाहनों की संख्या में कमी आएगी, बल्कि जाम और प्रदूषण से भी राहत मिल सकेगी। अभी हमारे देश में सार्वजनिक वाहनों की संख्या इतनी कम है कि लोगों को निजी वाहनों का प्रयोग करना पड़ता है, जो उनकी जेब पर तो भारी पड़ता ही है, देश की सेहत भी खराब करता है। -वंदना अग्रवाल, गाजियाबाद

तय हो चुनाव खर्च
विश्वविद्यालयों में होने वाली छात्र राजनीति को लेकर भी कानून बनाने चाहिए, खासतौर से चुनाव के दौरान प्रचार-प्रसार पर। अभी होता यह है कि प्रचार के नाम पर जमकर पैसा बहाया जाता है, इसलिए जरूरी है कि चुनाव प्रचार के दौरान खर्च की जाने वाली राशि तय हो। अभी दिल्ली विश्वविद्यालय में डूसू चुनाव (दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संगठन) को लेकर माहौल गरम है। इसके चलते तमाम संगठनों के उम्मीदवार हर वह तरीका अपना रहे हैं, जिससे वे छात्र-छात्रों के बीच पहुंच सकें। प्रचार के दौरान जमकर परचे भी उड़ाए जा रहे हैं, जो कॉलेज परिसर को गंदा करते हैं। ऐसे में, जरूरी है कि विश्वविद्यालय ऐसा कोई प्रावधान करे कि ये संगठन कागजों की यूं बर्बादी न कर सकें। डिजिटल तौर पर प्रचार-प्रसार हो, ताकि पर्यावरण व हमें जीवित रखने वाले पेड़ों पर रहम हो सके। -अयूब अली, दिल्ली

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  • Web Title:mail box column in hindustan on 08 september