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आरक्षण की आग

आरक्षण की आग
यह कहना गलत नहीं होगा कि आरक्षण का लाभ उठाकर अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार कर लेने वालों का भी एक आभिजात्य वर्ग बन चुका है, जो अपने समुदाय की बजाय केवल अपने परिवार के उत्थान में जुटा हुआ है। अब जबकि यह साबित होता जा रहा है कि आरक्षण बीमारी बन गया है, तब इसका स्थाई इलाज तलाशना समूची राजनीतिक बिरादरी की जिम्मेदारी बन जाती है। बेहतर होगा कि आरक्षण के समर्थन और विरोध में चल रहे आंदोलनों से निपटने के लिए तदर्थ उपाय तलाशने की बजाय, ऐसी व्यवस्था की जाए, जिससे समाज को टुकड़े-टुकड़े होने से बचाया जा सके। 21वीं सदी में केवल जाति के आधार पर किसी को पीछे धकेलने की कुप्रथा का कोई स्थान नहीं हो सकता। लिहाजा आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था की खुले मन से समीक्षा करते हुए उसका ऐसा विकल्प ढूंढ़ना चाहिए, जो भेदभाव रहित समाज की रचना में सहायक साबित हो। वरना समाज जातीय संघर्ष की आग में यूं ही झुलसता रहेगा। -विश्व वीर सिंह, नरौली, संभल

आलसी बनते हम
‘आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपु:’ अर्थात, आलस्य मनुष्य के शरीर का सबसे बड़ा शत्रु है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट की मानें, तो भारत की लगभग 42 करोड़ आबादी शारीरिक और मानसिक रूप से आलसी है। यह रिपोर्ट इस बात की इशारा करती है कि भारत में लोगों की जिंदगी और दिनचर्या सुव्यवस्थित नहीं है। भारतीयों में आलस्य का मुख्य कारण उनका लक्ष्यहीन जीवन बिताना है। भाग्य पर लोग कहीं अधिक विश्वास करते हैं। यदि यही स्थिति बनी रही, तो विकसित देश बनने का हमारा सपना जल्दी पूरा नहीं होने वाला। हमें ‘काल काल करे सो आज कर, आज करे सो अब’ पर अमल करते हुए सक्रिय होना होगा। -गीता आर्य, बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश 

बोझ बढ़ाती मेट्रो
दिल्ली में जब मेट्रो का निर्माण-कार्य जोरों पर चल रहा था, तो उस समय कई लोगों ने यह संशय प्रकट किया था कि भारत जैसे गरीब देशों में मेट्रो जैसी अत्यधिक खर्च वाली प्रणाली का किराया गरीब जनता वहन नहीं कर पाएगी और यह बाद में केवल पैसे वालों की सवारी बनकर रह जाएगी। तब तो सत्ताधारी वर्ग ने इसे खारिज कर दिया था, पर आज वही बात सत्य साबित हो रही है। मेट्रो का किराया अब काफी ज्यादा बढ़ा दिया गया है। अगर आम आदमी अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा मेट्रो पर ही खर्च कर देगा, तो वह खाएगा क्या और अपने बच्चों को पढ़ाएगा कैसे? दुनिया भर में जहां भी मेट्रो चल रही हैं, वहां पैसा कमाना इसका उद्देश्य नहीं, बल्कि शहर को जाम और प्रदूषण से मुक्त रखना है। इसीलिए वहां की सरकार इसे सब्सिडी भी देती है। मगर अपने यहां की सरकार पैसे की तंगी का बहाना बनाकर ऐसा करने से इनकार कर रही है। क्या यह नीति बदलनी नहीं चाहिए? -निर्मल कुमार शर्मा, प्रताप विहार, गाजियाबाद

पुलिस पर दाग
कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश पुलिस के एक सिपाही ने एक रिक्शे वाले को इतनी बेरहमी से मारा कि वह अधमरा हो गया। इसी तरह, पंजाब पुलिस के एक सिपाही ने एक आदमी और उसकी मां को मारा। ऐसी खबरें काफी आहत करती हैं। जेहन में यही सवाल उठते हैं कि क्या यही कानून के रखवाले हैं? यदि पुलिस का यही रवैया रहा, तो आने वाले समय में उस पर से लोगों का विश्वास पूरी तरह से उठ जाएगा। आज पुलिस की ऐसी छवि बन गई है कि वह पीड़ितों का नहीं, बल्कि अपराधियों का साथ देती दिखती है। लोग मदद मांगने के लिए उसके पास जाने से कतराते हैं। हमारे देश की पुलिस को अपनी इस छवि को बदलने की गंभीर कोशिश करनी चाहिए। -रोहित गुप्ता, मयूर विहार, दिल्ली

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  • Web Title:mail box column in hindustan on 07 september