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प्रकृति का बदला

प्रकृति का बदला
प्रकृति जब क्रोधित होकर सामने आती है, तो अंजाम कितना भयावह होता है, इसका उदाहरण कुछ दिनों पहले केरल में देखने को मिला, जहां करीब 500 लोगों ने बाढ़ की वजह से अपनी जान गंवाई। मगर केरल ही एक ऐसा राज्य नहीं है, जिसने इस साल प्राकृतिक आपदा को झेला है। नौ अन्य राज्यों में भी बाढ़ और भूस्खलन के कारण सैकड़ों लोगों की जान गई है। 21वीं सदी में भी इतनी तादाद में लोगों की मौत यदि आपदा से हो रही है, तो यह किसकी गलती है, सरकार की, व्यवस्था की या फिर प्रकृति की? प्रकृति तभी अपना रौद्र रूप दिखाती है, जब उसके साथ छेड़छाड़ की जाती है। असल में, लोग इतने लालची हो गए हैं कि जहां कहीं प्राकृतिक सुंदरता बची हुई है, वहां भी वे कंक्रीट के जंगल खडे़ कर रहे हैं। इसकी वजह से पारिस्थितिकी तो प्रभावित होती ही है, पूरा मानव समुदाय को नुकसान भी उठाना पड़ता है। इसलिए ‘गाडगिल कमेटी’ की सिफारिशों पर सरकार संजीदगी दिखाए और प्रकृति की चेतावनी को समझे। -पीयूष कुमार, नई दिल्ली

जाम से हाल-बेहाल
दिल्ली में जाम से लोग हर दिन जूझ रहे हैं। सुबह सब पर भारी पड़ती है। जाम के कारण नियत स्थान पर समय से पहुंचना मुश्किल हो जाता है। इन दिनों लगातार हो रही बारिश ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। बारिश की वजह से जहां जाम नहीं लगता था, वहां भी जाम की स्थिति बन जाती है। रूट बदलने के बाद भी इससे बचना संभव नहीं होता, मानो जाम में फंसना नियति हो गई हो। यमुना पार के इलाकों का हाल तो और भी बुरा है। -सुनाक्षी दुबे, दिल्ली

शिक्षकों पर भरोसा करें
कहावत है कि एक सड़ी हुई मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है। यह कहावत शिक्षा जगत पर बिल्कुल फिट बैठती है। इक्का-दुक्का सरकारी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ होता है या शिक्षक लापरवाही बरतते हैं, मगर खामियाजा पूरे सरकारी तंत्र की शिक्षा-व्यवस्था को भुगतना पड़ता है। दिल्ली में ही सरकारी स्कूलों में करोड़ों की लागत से सीसीटीवी कैमरे लगाने की योजना अमल में लाई जा रही है। मगर क्या वाकई इसकी जरूरत है? मेरा मानना है कि स्कूलों में सीसीटीवी कैमरे से ज्यादा जरूरत कंप्यूटरीकृत शिक्षा को बढ़ावा देने की है। स्कूलों में घटित होने वाली घटनाओं को रोक पाना काफी हद तक स्कूल प्रशासन द्वारा संभव है, इसलिए बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी के लिए ज्यादा से ज्यादा संसाधन अध्यापकों के अनुरूप होने चाहिए। वैसे भी जब हम अपने बच्चों को शिक्षकों की योग्यता पर भरोसा करके तालीम दिलाने के लिए स्कूल भेजते हैं, तो फिर सुरक्षा के संबंध में उन पर अविश्वास क्यों? - पिंटू सक्सेना, लखनऊ

कहर ढाते बादल
एक वक्त था, जब उत्तराखंड में हर मौसम सुहाना लगता था। लेकिन साल 2013 में आई आपदा के बाद राज्य की तस्वीर ऐसी बदली, मानो यह स्वर्ग खंडहर में बदलने लगा। बरसात का मौसम उत्तराखंड में हर साल कहर की तरह बरसने लगा है। आए दिन कहीं भूस्खलन, तो कहीं पर पहाड़ दरक रहे हैं। पहाड़ी हो या मैदानी इलाका, लोग मलबे में जिंदा दफन हो रहे हैं। इस साल अगस्त का एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरा, जब अखबारों के पन्नों पर बादलों के कहर बरपाने की खबरें न हों। अभी तक लोगों के घरों में पानी था, लेकिन अब लोगों के घर पानी में हैं।  प्रशासन भी मात्र संवेदना के दो शब्द बोलकर और लोगों को मुआवजा देकर अपना कर्तव्य पूरा कर ले रहा है। नतीजतन, आम जनजीवन ‘करो या मरो’ की स्थिति से जूझ रहा है। राज्य के आम लोगों की सुरक्षा के लिए शासन-प्रशासन को समुचित कदम उठाना चाहिए। -मीनाक्षी ठाकुर, देहरादून, उत्तराखंड

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  • Web Title:mail box column in hindustan on 06 september