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नोटा से परहेज जरूरी

नोटा से परहेज जरूरी
आजकल सोशल मीडिया पर चुनावों में नोटा (इनमें से कोई नहीं) के अधिक से अधिक इस्तेमाल का काफी ज्यादा प्रचार-प्रसार हो रहा है। मगर इस तरह का प्रचार करने वालों को यह समझना चाहिए कि उनकी समस्या का समाधान नोटा नहीं है, क्योंकि नोटा दबाने से हार-जीत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। सरकार फिर भी बनेगी। हां, इतना जरूर होगा कि जिससे आप नाराज होंगे, वह न जीते, मगर जिसके आप खिलाफ होंगे, वह जीत जाएगा। नोटा किसी भी राजनीतिक समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि ऐसा करने से कई दूसरी समस्याओं को बढ़ावा मिलेगा। देश के संविधान ने जो मतदान का अधिकार दिया है, उसे नोटा दबाकर महत्वहीन न बनाएं। अगर अपना गुस्सा दिखाना ही है, तो गलत लोगों के खिलाफ अपने क्षेत्र में अधिकतम वोट करके दिखाएं, ताकि देश की राजनीति साफ-सुथरी हो। नोटा का इस्तेमाल कहीं न कहीं भारतीय संविधान की अवमानना है। इससे हमें बचना चाहिए। -ललित शंकर, मेरठ

शिक्षक बनाम समाज
समाज और राष्ट्र-निर्माण में शिक्षक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वह विद्यार्थियों के बाल मन में ज्ञान, संस्कार और जिम्मेदारियों के बीज डालता है और उसे विकसित करने का दुरूह काम करता है। शायद इसीलिए हमारे आदि ग्रंथों में शिक्षक को साक्षात् ब्रह्म की उपाधि दी गई है। दुर्भाग्यवश आज शिक्षक और समाज का यह महत्वपूर्ण अंतर्संबंध सवालों के घेरे में है। जहां अधिकांश शिक्षक अपने पेशे को धन उपार्जन और अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने का साधन मात्र समझते हैं, वहीं समाज ने भी शिक्षकों के प्रति लगभग बेरुखी का नजरिया अपना लिया है। इस परिस्थिति में दोनों को यह सोचना होगा कि गलती कहां हुई और सुधार की पहल कहां से हो? -चंदन कुमार, देवघर

विधि आयोग के सुझाव
विधि आयोग ने अंतत: देश की आम सोच को समझा और उसे केंद्र सरकार के समक्ष रख दिया। बकौल आयोग, इस समय देश को समान नागरिक संहिता की जरूरत नहीं है। भारत बहुत विशाल देश है, जहां विविधता की संस्कृति इसकी धरती में रच-बस चुकी है। एक ही जिले के हर दस कोस पर जब यहां की भाषा-बोली या रहन-सहन बदल जाते हों, तो फिर सभी प्रदेशों व केंद्र शासित क्षेत्रों में हम कैसे एक समान कानून लागू कर सकते हैं? निश्चय ही इसकी जरूरत नहीं है। यह दरअसल अलग-अलग धर्म और संस्कृति मानने वालों को अलग-अलग दिखाकर एक बड़े खेमा का वोट हथिया लेने की कोशिश है। भला इस देश में कैसे यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू हो सकता है, जबकि फौजदारी कानून के प्रावधान ही राज्यवार अलग हैं? - जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर

बाढ़ पर राजनीति
आम लोगों और सरकारों के लिए इस वर्ष का मानसून मुश्किलों भरा साबित हुआ है। पूरे भारत में बारिश के चलते हाहाकार मचा हुआ है। सामान्य जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो चुका है। देश के लगभग 10 राज्य बाढ़ और भूस्खलन से लड़ रहे हैं। गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया केंद्र के अनुसार, देश में बारिश और बाढ़ के कारण 1,400 से ज्यादा लोगों की जान गई है। माली नुकसान अलग से हुआ है। ऐसे में, सरकारों पर जनता की सुरक्षा के लिए कड़े इंतजाम करने, स्वास्थ्य से जुड़ी उनकी समस्याओं को दूर करने की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है। विडंबना है कि बाढ़ पीड़ितों के लिए दूसरे राज्यों के लोग बढ़-चढ़कर मदद दे रहे हैं और राहत सामग्री जुटा रहे हैं, लेकिन राजनीतिक गलियारा इस पर भी राजनीति करने में जुटा है। यह स्थिति कचोटती है। देश की यह तस्वीर बदलनी चाहिए। -अयूब अली, दिल्ली

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  • Web Title:mail box column in hindustan on 05 september