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देवकी का बलिदान

देवकी का बलिदान 
कृष्ण जन्मोत्सव ‘बलिदान को याद करने का दिन है’। साहित्यकार नरेंद्र कोहली का यह वाक्य हमेशा प्रासंगिक रहेगा। उन्होंने अपने लेख में बिल्कुल सही लिखा है कि कृष्ण जन्मोत्सव देवकी और वसुदेव के बलिदान को याद करने का दिन है। भारत की पवित्र भूमि का आधार ही बलिदान और त्याग है। मातृभूमि की सुरक्षा के लिए बलिदान और त्याग को हमने एक संस्कृति के रूप में विकसित किया है। यही कारण है कि अनादि काल से आज तक जब-जब देश को बलिदान की आवश्यकता महसूस हुई, लोगों ने बढ़-चढ़कर बलिदान दिया। यह अकाट्य सत्य है कि देवकी ने अपनी छह संतानों का बलिदान श्रीकृष्ण के लिए नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश के लिए दिया था। अगर देवकी यह बलिदान न करतीं, तो कृष्ण का प्राकट्य नहीं होता, और जब कृष्ण ही इस धरा पर नहीं आते, तो न कंस का अंत होता और न महाभारत का रण होता। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मानव समाज को यह सीख देता है कि जब मानवता और धर्म पर संकट आ जाए, तब हमें तत्काल अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। -कुंदन कुमार, बीएचयू

खेलों में सुधरते हम
18वें एशियाई खेलों में हमारे खिलाड़ियों ने 69 पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया है। 1951 के बाद पहली बार हमने 15 सोना भी जीता है। ये तमाम पदक हमारे खिलाड़ियों ने काफी परेशानियों का सामना करते हुए जीते हैं, क्योंकि आज भी दूसरे देशों के मुकाबले हमारे खिलाड़ियों को सही और पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिलती हैं। इन खेलों में हम भी शीर्ष स्थान पर आ सकते हैं, बशर्ते खिलड़ियों पर पूरा ध्यान दिया जाए। अगर खिलाड़ियों को बेहतर माहौल मिलेगा, तो हमारे खाते में भी कई पदक आएंगे। -हर्ष गौतम

असहमति पर विवाद
लोकतंत्र की यह खूबसूरती है कि इसमें असहमति के स्वर को भी उचित सम्मान और स्थान दिया जाता है, जो इसे बाकी शासन व्यवस्थाओं से श्रेष्ठ बनाता है। लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज होते जा रहे हैं। सत्तापक्ष जहां जीएसटी को अपनी उपलब्धि बता रहा है, तो विपक्ष नोटबंदी के बहाने उस पर जमकर हमला कर रहा है। मगर इस आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति में जनता निराश और हताश खड़ी दिख रही है। हाल ही में उच्चतम न्यायलय ने भी इस बात की पुष्टि कर दी है कि विरोध करना लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की पहचान है। लेकिन राजनीतिक दलों या नागरिकों के भी कुछ कर्तव्य हैं। उन्हें विरोध का ऐसा तरीका अपनाना चाहिए, जो सार्थक और सकारात्मक होने के साथ-साथ सांविधानिक दायरे में भी हो। -मोहम्मद एजाज, वासेपुर, धनबाद

छात्र राजनीति से उम्मीदें
हमारे देश की सियासी तस्वीर किसी से छिपी नहीं है। हालात देखकर यह कहना भी गलत नहीं लगता कि हमारे नेता अब केवल अपने स्वार्थ के लिए वोटों की राजनीति कर रहे हैं। स्थिति यह है कि अटल बिहारी वाजपेयी के जाने के बाद यह माना जा रहा है कि ‘अटल युग’ का अंत हो गया है और कहीं न कहीं स्वच्छ राजनीति भी खत्म हो गई है। इन परिस्थितियों में सबकी उम्मीदें आने वाली पीढ़ी के नेताओं पर है। मगर तीन दिन से डीयू छात्र संघ के विद्यार्थियों के बीच मारपीट और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने की जो खबरें आ रही हैं, वे बहुत से लोगों की उम्मीदें तोड़ रही हैं। माना यही जाता रहा है कि युवा नेता हमारे देश की राजनीति को स्वच्छ बनाएंगे और एक नए युग की शुरुआत करेंगे। मगर अब सवाल यह उठने लगा है कि क्या युवा नेता देश की नई तस्वीर पेश कर सकेंगे? -नीतू कुमारी, श्याम लाल कॉलेज, डीयू

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  • Web Title:mail box column in hindustan on 04 September