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कश्मीर समस्या का हल

कश्मीर समस्या का हल
कश्मीर की धरती आज जिस खौफ के साये में जी रही है, उसके लिए वहां के नौजवान और हुर्रियत के नेता जिम्मेदार हैं। आखिर भारत सरकार कब तक उनकी हिमाकतों को गुमराह लोगों की उछल-कूद मानती रहती? इसलिए वहां सेना के मौजूदा ऑपरेशन की कामयाबी के लिए देश के तमाम नागरिकों और सभी पार्टियों के नेताओं को अपना मुखर समर्थन देना चाहिए। आखिर सब्र की भी एक सीमा होती है। पिछले चार वर्षों में ही हमारे सैकड़ों जवान दहशतगर्दों की गोली के शिकार बन चुके हैं, इसलिए अब आर-पार की जंग होनी चाहिए। घाटी को सरकार ने हरसंभव मदद पहुंचाने की कोशिश की। दशकों से वहां सारे संसाधन नई दिल्ली से पहुंचाए जाते रहे, मगर मुफ्तखोर जमातों ने इसे हमारी कमजोरी के रूप में लिया। अब वक्त आ गया है कि सरकार एक-एक घर की तलाशी ले, जम्मू-कश्मीर के संविधान को खारिज करे और उसे मिली तमाम पुरानी सांविधानिक सुविधाएं खत्म करे, तभी इसका स्थाई हल निकल सकेगा। -राकेश राय, न्यू पुनाईचक, पटना-23       

सवालों में नोटबंदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का एलान करते हुए देशवासियों को बड़ी उम्मीदें बंधाई थीं कि देश की अर्थव्यवस्था से काले धन का सफाया हो जाएगा। अब जब आरबीआई ने आंकडे़ जारी कर दिए हैं, तो यह साफ हो गया है कि नोटबंदी का कदम गलत था। देश के खजाने को इससे नुकसान पहुंचा है, बल्कि प्रकारांतर से इस कदम ने काले धन वालों की मदद ही की है, उनके सारे काले धन सफेद हो गए। सही बात तो यह है कि सबसे ज्यादा काला धन रियल इस्टेट और जमीन की खरीद-फरोख्त में लगा है, मगर इस सरकार ने उस मोर्चे पर कुछ भी खास कदम नहीं उठाया। सवाल उठता है कि 50 दिनों में सौ से अधिक लोगों की असमय मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा? सरकारें नीतिगत फैसले लेती हैं और यह जरूरी भी है, मगर कोई भी फैसला करने से पहले उन्हें सैकड़ों मशवरों से गुजरना होता है। केंद्र सरकार को बताना चाहिए कि आखिर नोटबंदी के फैसले से देश की अर्थव्यवस्था को कितने का नुकसान पहुंचा है? निस्संदेह, इस मसले को विपक्ष आने वाले आम चुनाव में जोर-शोर से उठाएगा और तब सरकार के लिए जवाब देना मुश्किल होगा। इस पूरे प्रकरण का अनिवार्य सबक यही है कि किसी भी बडे़ नीतिगत फैसले से पूर्व सरकार हजार बार सोचे। -आकाश शर्मा, सेक्टर- चार, वैशाली, गाजियाबाद

बढ़ती सड़क दुर्घटनाएं
उत्तर प्रदेश सरकार सूबे की सड़कों को गड्ढा मुक्त करने और उनके चौड़ीकरण के प्रयास कर रही है, फिर भी सड़क दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। वाहन चालकों की लापरवाही इसकी सबसे बड़ी वजह है। कई चालक तो नशे की हालत में भी गाड़ी चलाते हैं, तो कई सारे कान से मोबाइल लगाए रखते हैं। दोपहिया वाहनों पर तो तीन-चार युवा बैठकर स्टंट करते हैं। हॉर्न भी तेज होते हैं। साइलेंसर से इतनी तेज आवाज व धुएं निकलते हैं कि कानों में अंगुली देनी पड़ती है। दोपहिया और चौपहिया वाहनों को नशे की हालत में चलाने पर जब तक सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक दुर्घटनाओं की संख्या में कमी नहीं होने वाली। -श्याम सिंह, माछरा, मेरठ, उत्तर प्रदेश

ताकि बेहतर शिक्षा मिले
हमारे देश में स्तरीय शिक्षा की राह में दो मुख्य कठिनाइयां हैं। एक तो कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या का ज्यादा होना, जिसकी वजह से शिक्षक हरेक विद्यार्थी से संपर्क कायम नहीं कर पाता और दूसरा वह वातावरण नहीं बन पाता है, जिसमें विद्यार्थी स्वयं शिक्षक से सवाल पूछ सके। जितने ज्यादा सवाल विद्यार्थी शिक्षक से पूछेंगे, उतनी ही कक्षा जीवंत होगी। इसलिए कोशिश होनी चाहिए कि ऐसा माहौल बने, जिसमें छात्र ज्यादा से ज्यादा सवाल पूछ सकें। -नवीनचंद्र तिवारी, रोहिणी, दिल्ली

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  • Web Title:mail box column in hindustan on 03 September