Hindustan mail box on 23 February - मेल बॉक्स DA Image
18 नबम्बर, 2019|8:20|IST

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मेल बॉक्स

 
शिशुओं की मौत
शिशुओं की मौत को लेकर आए नए आंकड़े दुखद हैं। आज भारत डिजिटल हो रहा है, बावजूद इसके इतने बच्चों की मौत हैरान कर देने वाली बात है। चाहे देश विज्ञान के क्षेत्र में आगे क्यों न बढ़ा हो, लेकिन कभी गोरखपुर, तो कभी कहीं और बच्चे दम तोड़ ही रहे हैं। शिशुओं की मौत की बड़ी वजह गर्भवती महिलाओं को सही से इलाज न मिल पाना है। आज भी देश में सरकारी अस्पतालों की संख्या बहुत कम है। जिस देश में बड़ी आबादी गरीब हो, वहां बुनियादी चिकित्सा सुविधा का भी न होना उसके विकास की कलई खोलता है। कहा जा रहा है कि शिशुओं की मौत के मामले में पाकिस्तान हमसे आगे है। मगर क्या हमें इस मामले में किसी देश से तुलना करनी चाहिए? प्रयास तो इस समस्या को जड़ से खत्म करने के होने चाहिए। देश में अगर यूं ही शिशु दम तोड़ते रहे, तो भारत का भविष्य भला कहां उज्ज्वल रह पाएगा? केंद्र व राज्य सरकारों को इस दिशा में सक्रियता से सोचना चाहिए।

अखिल सिंघल, डीयू

ईमानदार जांच
कुछ लोग मान रहे हैं कि पीएनबी महाघोटाले की नींव मनमोहन सरकार के समय रखी गई थी। माना कि इसकी शुरुआत मनमोहन सरकार के समय हुई थी, फिर मोदी सरकार ने इस महाघोटाले की मजबूत इमारत क्यों तैयार होने दी? मनमोहन सरकार में तो और भी घोटाले होने की खबर आई थी। उन सबके लिए मोदी सरकार ने क्या किया? नोटबंदी के समय बैंकों में गड़बड़ी की जो खबरें आ रही थीं, तब भी क्या देश में मनमोहन सिंह की सरकार थी? लिहाजा यदि केंद्र सरकार अपनी निष्पक्षता साबित करना चाहती है, तो वह इस महाघोटाले की जांच जल्द से जल्द स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) से कराए? बैंकों को ऐसे लोग जरूर चाहिए होते हैं, जो उनसे लोन ले, पर इसका मतलब यह तो नहीं कि वह किसी पर भी आंखें मूंदकर विश्वास कर ले। लोन देने के कायदे-कानून सबके लिए बराबर होने चाहिए। अगर किसी आम आदमी को अपना आशियाना बनाने के लिए बैंक से कर्ज लेना होता है, तो बैंक सबसे पहले यही पता करने की कोशिश करते हैं कि लोन की राशि वह लौटा पाने में समर्थ है या नहीं? ऐसे नियम सभी के लिए होने चाहिए।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

बढ़ता अपराध
आधुनिक समय में समाज की सेहत धीरे-धीरे बिगड़ती जा रही है। इस सवाल का जवाब ही नहीं दिख रहा कि समाज में बढ़ रहे जुर्म को खत्म करने के लिए किस तरह के उपाय अपनाए जाने चाहिए? चाहे बलात्कार की घटना हो या सरेराह खून-खराबे की, इन अपराधों ने समाज में अपनी जड़ें मजबूत बना ली हैं। आलम यह है कि छोटी-छोटी बच्चियां तक आज सुरक्षित नहीं हैं। ऐसे में, जरूरी है कि सकारात्मक सोच के साथ बदलाव की प्रक्रिया को अमली जामा पहनाया जाए। जब तक हमारी मानसिकता नहीं बदलेगी, वारदात यूं ही बढ़ते रहेंगे।

मोना कपूर, दिल्ली

विवादों में आप
आम आदमी पार्टी को जब से दिल्ली की सत्ता मिली है, उसकी सरकार विवादों में रही है। अब दिल्ली के मुख्य सचिव ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री के आवास पर हुई बैठक के दौरान उनके साथ ‘आप’ के कुछ विधायकों ने हाथापाई की। सवाल यह है कि बैठक आधी रात को क्यों बुलाई गई? ऐसी बैठकें आमतौर पर तभी बुलाई जाती हैं, जब राज्य में कोई आपातकालीन (प्राकृतिक आपदा, भूकंप) स्थिति बन गई हो। मगर दिल्ली में ऐसा कुछ नहीं था। इसी तरह, बैठक अगर लोगों को राशन मुहैया करवाने को लेकर थी, तो खाद्य मंत्री इसका हिस्सा क्यों नहीं थे? आप सरकार को इन सवालों के जवाब देने चाहिए। 

चंद्र मोहन गौड़

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