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पानी का दुरुपयोग

संपादकीय पेज (03 जून) पर लापरवाह दौर, ममता सिंह की फेसबुक वॉल से पढ़ा। आंखों देखी घटना के माध्यम से, जल-संरक्षण के प्रति लोगों की मानसिकता को इंगित किया गया है। आज एक तरफ जल संकट है और कुछ लोग जीवन-यापन के लिए कोसों दूर से पानी ढोकर ला रहे हैं, तो दूसरी तरफ कुछ लोग जल-संसाधन के महत्व को बिना समझे पानी अंधाधुंध बरबाद कर रहे हैं। विडंबना यह है कि इस बरबादी में पढ़े-लिखे लोग अधिक हैं। एक-दूसरे की देखा-देखी बोरवेल कराकर वे भूजल भी उपयोग में ला रहे हैं, जबकि उनके क्षेत्र में पानी की कोई विशेष दिक्कत नहीं। जल की एक बूंद को पीने योग्य बनने में लगने वाले श्रम की जानकारी सभी को हो सके और सभी लोगों तक जल उपलब्ध हो सके, इसके लिए जल संरक्षण के प्रति जोरदार जागरूकता अभियान चलाए जाने की जरूरत है। इसके साथ-साथ जल बरबाद करने वाले लोगों के लिए दंडात्मक कानून भी बनाया जाना चाहिए। 
रामप्रकाश शर्मा, वसुंधरा, गाजियाबाद

कंपनी की मनमानी 
बीएसईएस गरमी के मौसम में आजकल ग्राहकों को अपनी धमक दिखा रही है। जिन ग्राहकों की केवाईसी हो गई थी, उनको नए घरेलू बिजली कनेक्शन देने से वह इसलिए मना कर रही है कि उनकी बिल्डिंग की ऊंचाई 15 मीटर से अधिक है और ईडीएमसी को बिल्डिंग पर आपत्ति है, जबकि बिल्डिंग बनाते वक्त कंपनी बिल्डर को अस्थाई कनेक्शन देती है और बिल्डर से बिल्डिंग बनाने की परमिशन भी चेक नहीं की जाती। इस कारण घर खरीदने वाले ग्राहक बिल्डर और बीएसईएस के जाल में फंसकर गरमी में परेशान हो रहे हैं।
राजेंद्र कुमार, एमएस पार्क, शाहदरा

बचकानी हरकत
इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग की ओर से आयोजित इफ्तार पार्टी में सुरक्षा के नाम पर मेहमानों से पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारियों ने जिस तरह का दुव्र्यवहार किया, वह बहुत ही शर्मनाक है। इस घटना पर भारतीय उच्चायोग ने बेशक अपना विरोध दर्ज करा दिया है, लेकिन पाकिस्तान आदतन मजबूर है। वह अपनी नापाक हरकतों से कभी बाज नहीं आएगा। कौन अतिथि चाहेगा कि अपनी बेइज्जती करवाकर कार्यक्रम में शामिल हो। इतना ही नहीं, पाकिस्तान की विपक्षी पार्टियों के राजनेताओं को भी इफ्तार में शामिल होने से रोका गया। इफ्तार पार्टी तो एक तरह से औपचारिक मिलन है, ताकि आपसी रिश्तों को मजबूत किया जा सके। मगर लगता है कि पाकिस्तान अपनी बचकानी हरकतों से ही खुश है। आखिर उसे इससे क्या हासिल होगा?
सुरेश गोयल, हिसार, हरियाणा

चुनौतियों के ढेर पर
चुनाव हारने के बाद नैतिक जिम्मेदारी लेना और इस्तीफे देना एक आम रिवाज है। देश की दूसरी सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते कांग्रेस अध्यक्ष का दबाव में दिखना अप्रत्याशित नहीं है। कांग्रेस अपने पुराने ढर्रे पर चलकर सभी नुकसानों की भरपाई की नाकाम कोशिश करती रही। पार्टी मुखिया के अंदाज में गर्मजोशी की कमी पहले ही जाहिर हो चुकी थी। वंशवाद के दाग से उबरने की कोशिशों के बावजूद वंश के चक्रव्यूह से निकलने में पार्टी पूरी तरह असफल रही। डरे-सहमे कांग्रेस अध्यक्ष की जुबां पर आखिर वह दर्द छलक ही आया। बेशक कांग्रेस की जड़ को दीमकों ने खोखला कर दिया है, मगर इनसे निजात पाने की कोशिश में कहीं यह पुराना दरख्त जमींदोज न हो जाए। ऐसे में, दल में नई जान फूंकने के वास्ते एक जादुई चेहरे की जरूरत होगी, जो राजनीति के पुराने सिलेबस से निकलकर नए नुस्खे आजमाने का हौसला रख सके। निश्चित रूप से राहुल गांधी के सामने चुनौतियों का अंबार है, मगर मौका भी है और दस्तूर भी।
एमके मिश्रा
 रातु रोड, रांची, झारखंड
 

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