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चुनाव खर्च पर लगाम

आज तक न तो चुनाव आयोग ने और न आयकर विभाग ने किसी प्रत्याशी से यह पूछा है कि चुनाव पर उसने जो खर्च किया, वह पैसा आया कहां से? चुनाव खर्च की तय सीमा तो मात्र दिखावे के लिए है, असल खर्च 10-20 करोड़ रुपये है। कई बार तो ऐसी खबरें भी आई हैं कि चुनाव के समय हवाला के जरिए प्रत्याशियों के पास इतना पैसा इस उम्मीद से पहुंचता है कि यदि वे जीत गए, तो पैसा पहुंचाने वाले लोगों को वे कई तरीकों से लाभ पहुंचाएंगे। पिछले तीन दशकों से लगभग सभी पार्टियां चुनाव सुधार की बातें करती रही हैं। विपक्ष में रहते हुए वे इस मुद्दे पर खूब शोर भी मचाती हैं, लेकिन जब सत्ता में आती हैं, तो सब कुछ भूल जाती हैं। आज प्राय: हर पार्टी धन और बाहुबल से चुनाव जीतती है। मतदाता भयभीत होकर इस खेल को देखते रहते हैं। क्या इसको रोकने के लिए नागरिकों का कोई आंदोलन नहीं होना चाहिए? (सुभाष बुड़ावन वाला, मध्य प्रदेश)

जानते हुए भी अनजान
आज शायद ही कोई यह नहीं समझता होगा कि जल ही जीवन है और बिना पानी सब कुछ शून्य है। फिर भी लोग अपने दुश्मन स्वयं बनते जा रहे हैं। वे दिन-रात बेमतलब इस बहुमूल्य संपदा को नष्ट करने में लगे हुए हैं। घरों में तो पानी बर्बाद किया ही जा रहा है, गाड़ियों की साफ-सफाई के नाम पर भी इसका खूब दुरुपयोग किया जा रहा है। इससे यही लगता कि वह समय अब ज्यादा दूर नहीं है, जब पीने योग्य शुद्ध जल सुलभ नहीं होगा। अगर देशवासी समय रहते सतर्क नहीं हुए, तो एक दिन हम पानी को लेकर आपस में लड़-कट मरेंगे। सरकार को इस दिशा में गंभीरता से सोचना चाहिए और हर व्यक्ति को जागरूक बनाना चाहिए, ताकि वे पानी का किफायती इस्तेमाल करें। (जसबीर सिंह सिसोदिया)

अध्यक्ष की खोज
देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से ही अपने वजूद की जंग लड़ रही है। पार्टी के गिरते प्रदर्शन को देखते हुए सोनिया गांधी ने अध्यक्ष पद बेटे राहुल गांधी को थमा दिया था, मगर राहुल के नेतृत्व में कई राज्यों में मिली हार से स्थिति बदतर हो गई। बीते महीनों में हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में पार्टी ने सरकार बनाई जरूर और यह लगा भी कि 2019 आम चुनाव में उसको संजीवनी मिलेगी, लेकिन मोदी लहर ने कांग्रेस को राष्ट्रीय राजनीति में बिल्कुल हाशिए पर ला खड़ा किया। हार से हताश होकर राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है और यह घोषणा की है कि नया अध्यक्ष नेहरू-गांधी परिवार से नहीं होगा। पर यह स्थिति भी कांग्रेस के लिए सुखद नहीं है। नेहरू-गांधी परिवार को कांग्रेस का ऑक्सीजन कहा जाता है, ऐसे में यदि कांग्रेस इस परिवार से दूर जाती है, तो पार्टी में विभाजन हो सकता है। इस बाबत संकेत भी मिलने लगे हैं। अध्यक्ष पद को लेकर युवा और बुजुर्ग नेताओं में एकराय नहीं बन पा रही है। यह उलझन पार्टी की सेहत के लिए ठीक नहीं। कांग्रेस के जिम्मेदार नेताओं को इस समस्या का हल ढूंढ़ना चाहिए। (कृष्णा बाजपेयी)

क्या बदलेगी सरकार
कर्नाटक में फिर सरकार बदलने के आसार नजर आ रहे हैं। विधायक इस्तीफे दे रहे हैं और राजनीतिक उठापटक शुरू हो गई है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि सत्तारूढ़ पार्टियों से हो रहे इस्तीफों के पीछे ‘कमल’ का हाथ है और इसे साबित करने के लिए कई सुबूत भी पेश किए जा रहे हैं, जबकि इस्तीफे देने वालों ने ऐसी कोई बात नहीं कही है। हालांकि देश भर में कांग्रेस से इस्तीफे देने वालों की बाढ़ सी आ गई है। स्वयं कांग्रेस अध्यक्ष भी इस्तीफा दे चुके हैं। ऐसे में, यह देखना दिलचस्प होगा कि इस्तीफों की बाढ़ के बीच हिचकोले खाती कर्नाटक सरकार इस संकट से उबरती है या ढह जाती है? (महेश नेनवा, इंदौर)

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  • Web Title:Hindustan Mail Box Column on 9th July