Hindustan Mail Box Column on 8th August - गीदड़ भभकी DA Image

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गीदड़ भभकी

अनुच्छेद 370 को हटाने के मोदी सरकार के फैसले के बाद पाकिस्तान की बौखलाहट से स्पष्ट है कि इस अनुच्छेद का लाभ उठाकर वह किस तरह कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देता रहा है। चूंकि अब वहां उसके मनसूबे सफल नहीं हो पाएंगे, इसलिए इमरान खान पुलवामा जैसे हमले होने की बात कह रहे हैं। वह शायद यह भूल गए हैं कि भारत इन गीदड़ भभकियों से डरने वाला नहीं है। जब मोदी सरकार सात दशक पुरानी ऐतिहासिक भूल को सुधार सकती है, तो वह नापाक पाकिस्तान को भी उसकी हैसियत याद करा सकती है। पाकिस्तान को यह नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और यहां उसके नापाक इरादों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। पाकिस्तान जिस अमेरिका की मध्यस्थता से कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाना चाहता था, उसने इसे भारत का आंतरिक मसला बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया है। इसीलिए पाकिस्तान कश्मीर भूलकर अपनी घरेलू समस्याओं पर ध्यान दे, वही उसके लिए श्रेयस्कर है।
वंदना अग्रवाल, गाजियाबाद


याद रहेंगी सुषमा

हमारे बीच से भूतपूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज चली गईं। वह नारी शक्ति की प्रतीक थीं, नारी शक्ति के साथ थीं। हमने हमेशा उन्हें अपना समझा, क्योंकि किसी भी भारतीय की समस्या को वह अपने परिवार के सदस्य की तरह महसूस करती थीं। खासतौर से परदेश में रहने वाला भारतीय जब अपनी समस्या ट्वीट के जरिए भी साझा करता, तो सुषमा स्वराज उसके हल में प्रयासरत हो जातीं। अब वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार जिंदा हैं। ऐसी नेत्री को देश हमेशा याद रखेगा।
सुमन मलिक, न्यू आर्य नगर, मेरठ

लाजवाब वक्ता

अपने विचारों को उचित शब्दों में पिरोकर व्यक्त करना और उन शब्दों को श्रोता के मन-मस्तिष्क पर अंकित करा देना एक अद्वितीय कला है। सुषमा स्वराज ऐसी ही कला की धनी थीं। अब हमारे बीच उनका शरीर नहीं है, लेकिन उनकी वाणी चारों ओर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। निश्चय ही, देश उनके आचरण, विचार, कर्मठता और योगदान को युगों-युगों तक याद रखेगा। देश ने एक लाजवाब वक्ता, मृदुल महिला और कर्मठ नेता को खो दिया है। इस कमी को भर पाना आसान नहीं है।
दीपा डिंगोलिया, रोहिणी, दिल्ली

बेजा विरोध

एक समय था, जब हड़ताल से सरकार पर दबाव बनता था, लेकिन अब लोग आत्महत्या या आत्मदाह भी कर लें, तो सरकारों पर शायद ही फर्क पडे़। इसीलिए राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) बिल को लेकर डॉक्टर देशव्यापी हड़ताल भले कर लें, लेकिन इससे सरकार पर कोई दबाव नहीं बनेगा, क्योंकि यह बिल संसद के दोनों सदनों से पारित हो चुका है। वैसे भी, यह बिल संसद में पेश होने से पहले एक महीने तक सुझावों के लिए ओपन फोरम पर रखा गया था। किसी को यदि आपत्ति थी, तो सरकार ने उन्हें अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया था। इतना ही नहीं, मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया के भ्रष्टाचार के कई सुबूत अखबारों की सुर्खियां बने थे। डॉक्टर ऐसी भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ तो कभी हड़ताल पर नहीं गए? इसीलिए मरीजों को कष्ट देकर डॉक्टरों को कुछ हासिल नहीं होने वाला। उन्हें पहले आत्मचिंतन करना चाहिए।
एल पी श्रीवास्तव, मुजफ्फरनगर

हादसों से सबक

पहाड़ों में लगातार हो रहे सड़क हादसों से सरकार को सबक लेना चाहिए। दुर्घटनाएं रोकने के लिए जरूरी है कि वाहनों की निरंतर चेकिंग हो और सीट से अधिक सवारी बैठाने वाली गाड़ियों पर कार्रवाई की जाए। हादसे रोकने की कोशिश सड़कों पर दिखनी चाहिए।
तोहिष भट्ट, साईं कॉलेज, देहरादून

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