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मुस्कान भी जरूरी

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का मानना है कि देश में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के ठीक होने के साथ-साथ ग्रॉस हैप्पीनेस (सकल सुख) का दुरुस्त होना भी जरूरी है, और इसका मूल आधार शिक्षा ही है। उन्होंने यह भी कहा कि विदेशों में व्यक्ति की खुशी के लिए भी सरकारें काम करती हैं, जबकि हमारे यहां कागजी घोडे़ ज्यादा दौड़ते हैं। आज भी धरातल पर हमारी शिक्षा पद्धति को बेहतर आयाम नहीं मिल पाया है। सरकारी स्कूल सबसे पीछे हैं, जहां शिक्षा तो सस्ती है, पर बहुत कमजोर भी है। इसके उलट, निजी स्कूलों में शिक्षा का स्तर अच्छा है, लेकिन इन स्कूलों की फीस इतनी अधिक है कि ये आम लोगों के बस के बाहर हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों पर पढ़ाई से इतर सरकारी कार्यों का बोझ है, तो निजी स्कूलों में बच्चों पर बस्ते का। अगर ये दोनों कम हो जाएं, तो सरकारी स्कूलों की सेहत जरूर सुधर सकती है, जिससे ग्रॉस हैप्पीनेस बढ़ सकेगी।

शकुंतला महेश नेनावा, गिरधर नगर, इंदौर

रूस का साथ

इतिहास साक्षी है कि भारत पर जब-जब कोई विपदा आई है, रूस ने एक विश्वसनीय और मजबूत मित्र की तरह हमारा साथ दिया है। पिछले सात दशकों से रूस हमारा एक भरोसेमंद साथी और हर मौके पर साथ निभाने वाला मजबूत दोस्त रहा है। बीच के कुछ समय में भारतीय कर्णधारों का झुकाव अमेरिका जैसे देश की तरफ किन्हीं कारणों से हो गया था, लेकिन अमेरिका जैसे देश इस दुनिया में किसी के स्थाई दोस्त नहीं हो सकते। जिस देश से उनका व्यापारिक हित सधता है, वे उसी के सगे हो जाते हैं। व्यापारिक स्वार्थ समाप्त होते ही उनकी दोस्ती भी खत्म हो जाती है। इसके विपरीत रूस व पुराने सोवियत संघ की स्थापना ही दुनिया के गरीबों, मजलूमों, किसानों और मजदूरों के हित-साधन के सर्वोच्च लक्ष्य के साथ हुई। इसलिए हमारे लिए रूस के साथ आगे बढ़ना ही श्रेयस्कर है।

निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

लोग कब सुधरेंगे

जब से नया मोटर यान विधेयक लागू हुआ है, इसकी आलोचना सुनने को मिल रही है। कुछ लोगों का चालान उनकी गाड़ी की कीमत से भी अधिक का कटा है। मीडिया में इन खबरों को जगह भी खूब मिल रही है। लेकिन इन सबके बीच इस पर भी विचार करना आवश्यक है कि क्या वाकई सरकार ने गलत कदम उठाया है? क्या इस कानून से हम लोगों को लूटा जा रहा है या फिर हम अनुशासित होकर सड़कों पर नहीं चलते? क्या बिना हेलमेट के वाहन चलाना, बाइक पर तीन या चार लोगों की सवारी करना और वाहन चलाते समय मोबाइल पर बातें करना गलत आचरण नहीं है? क्या ऐसा करके हम खुद की और दूसरों की जान जोखिम में नहीं डाल रहे हैं? साफ है, जब हम बडे़ परिप्रेक्ष्य में पूरे मुद्दे को देखेंगे, तो हमें सरकार का यह कदम न्यायसंगत लगेगा। यह कानूनी संशोधन कोई लोक-लुभावन फैसला नहीं है, बल्कि जनहित में लिया गया एक कठोर निर्णय है।

मुकेश गुप्ता, ग्रेटर नोएडा वेस्ट, उत्तर प्रदेश

भारी अर्थ-दंड हल नहीं

जनता की लापरवाही ने सरकार को कठोर अर्थ-दंड वाले कानून बनाने को बाध्य कर दिया। मगर भारी अर्थ-दंड इसका हल नहीं है, लोगों को जागरूक करना ज्यादा जरूरी है। सड़कों की हालत सुधारना और त्योहारों पर सड़कों पर पंडाल न बनने देना भी जरूरी है। इसके लिए स्थानीय प्रशासन को जागरूक करना होगा। गाड़ियों की पार्किंग व्यवस्था भी ठीक नहीं है, पुरानी गाड़ियां सड़कों और गलियों में महीनों तक यूं पड़ी रहती हैं, जैसे उनका कोई मालिक ही नहीं। इन गाड़ियों को भी स्थानीय प्रशासन को उठवाना चाहिए। एक बार लोग जागरूक हो जाएंगे, तो फिर देश को किसी भारी जुर्माने वाले कानून बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

गजानंद पारीक, दिल्ली
 

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