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ऐतिहासिक फैसला

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 का खत्म किया जाना केंद्र सरकार का एक अत्यंत साहसिक फैसला है। इस फैसले ने एक तरफ जहां जम्मू-कश्मीर के लोगों को नए सिरे से ऊर्जान्वित किया है, वहीं दूसरी तरफ पूरे देश को खुश होने का मौका भी दिया है। बहुप्रतीक्षित कार्य को सांविधानिक तरीके से अमलीजामा पहनाकर एक बार फिर मोदी सरकार ने यह सिद्ध कर दिया कि देश की एकता और अखंडता के लिए वह कठिन से कठिन योजनाओं को भी क्रियान्वित करने के लिए हमेशा तैयार है। अनुच्छेद-370 से प्राप्त विशेष सुविधाओं का दुरुपयोग करने और इसकी आड़ में अपनी राजनीति चमकाने वाले नेताओं और अलगाववादियों की सारी दुकानें बंद हो गई हैं। इसीलिए इस फैसले से कुछ लोगों में बेचैनी है। बहरहाल, केंद्र सरकार इस ऐतिहासिक फैसले के लिए शुक्रिया की हकदार है। (महुआ सिंह राय, वैशाली)

कश्मीर से अलग
निस्संदेह, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 का खत्म होना सरकार की बड़ी जीत मानी जाएगी। यह भाजपा के एजेंडे में भी था। लेकिन उन परिस्थितियों को कोसा नहीं जा सकता, जिसमें अनुच्छेद-370 अस्तित्व में आया। अब सरकार घाटी में विकास की बात कर रही है। रियल एस्टेट कंपनियां इसमें बढ़-चढ़कर रुचि दिखाएंगी ही। मगर वहां कंक्रीट का जंगल न बने, इसकी गंभीर कोशिश सरकार को करनी चाहिए। अगर वह धरती का स्वर्ग है, तो स्वर्ग ही रहे, नरक न बने। सरकार के संकल्पपत्र में और भी मुद्दे थे, जिस पर भी उसे सकारात्मक कदम उठाना चाहिए। कई मामलों में करनी और कथनी में अंतर दिखा है। यह चिंता का विषय है। सरकार को बाकी मसलों की भी सुध लेनी चाहिए। (मोहम्मद आसिफ,  दिल्ली)

नया भूगोल
मुल्क ने उस वक्त एक तेज झटका-सा महसूस किया, जब कश्मीर पुनर्गठन बिल संसद में पेश किया गया। बेशक सरकार के इस कदम से किसी को हैरानी नहीं हुई, मगर तमाशा तो होना ही था। इतिहास में दर्ज सोमवार का दिन हल्के से सन 75 की रात याद दिला गया। अजीब इत्तफाक है कि मसले अलग, दायरा अलग, मगर टीस एक जैसी। 72 बरसों से रटाया गया अनुच्छेद-370 का इतनी आसानी से जुबान से उतरना यकीनन मुश्किल है। इस प्रावधान का एलान नेहरूकालीन भूल थी या वक्त की मांग, इस मसले पर बहस फिलहाल खत्म होने वाली नहीं है। इसके आगे-पीछे चाहे जितने सवालात हों, मगर कश्मीर अब हमारा मेहमानगाह न रहा। वषार्ें तक कश्मीर हिन्दुस्तान सहित पूरी दुनिया के सामने एक पहेली बना रहा। मगर मोदी-शाह की जोड़ी ने कश्मीर के इतिहास का नया भूगोल दुनिया के सामने रखकर सबको चौंका दिया। सूबे को खास दर्जा मिलने या छिन जाने का सियासी मतलब कुछ भी हो, फायदे-नुकसान का फैसला वक्त पर छोड़ना ही उचित होगा। (एम के मिश्रा, रांची)

पानी-पानी एनसीआर
मंगलवार को दिल्ली-एनसीआर में हुई बारिश से यह पूरा इलाका पानी-पानी हो गया। स्थानीय प्रशासन लगातार दावे करता है कि नालों की साफ-सफाई हो चुकी है और जलभराव की स्थिति नहीं आने दी जाएगी, लेकिन सच्चाई यही रही कि एकाध घंटे की तेज बारिश से ही चारों ओर जलभराव दिखने लगा। फिर, पानी उतरने के बाद कचरा इस तरह पसर गया कि लगा, देश-दुनिया का कूड़ा पूरे शहर में आ गया है। यह स्थिति बताती है कि स्थानीय प्रशासन अब तक मात्र कोरा आश्वासन देता रहा। उसके दावे भी झूठे ही हैं। जब दिल्ली-एनसीआर का यह हाल है, तो देश के बाकी हिस्सों की सूरत कैसी होगी, इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। इसे बदलने के प्रयास जरूरी हैं। क्या इसी मशीनरी के बूते हम स्वच्छ भारत का सपना साकार करेंगे? (दीपक, इंदिरापुरम, गाजियाबाद) 

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