Hindustan Mail Box Column on 6th August - नई लकीर DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

नई लकीर

अनुच्छेद 370 को हटाकर पूर्ण बहुमत वाली एनडीए सरकार ने जन-मत की आशा और विश्वास के नए मायने स्थापित किए हैं। कल तक यह स्वप्न ही परोसा जा रहा था कि जम्मू-कश्मीर हमारा अभिन्न अंग है, मगर अब यह विधिवत हो गया है। विशेषाधिकार वाले इस अनुच्छेद 370 ने न जाने क्या-क्या किया, कितने सैनिक खेत रहे, कितने निर्दोष नागरिक मारे गए और कितने ही कश्मीरी पंडितों को न सिर्फ वहां से खदेड़ा गया, बल्कि उनकी जमीन भी हड़प ली गई। यानी अनुच्छेद 370 एक धाव था भारत माता की पीठ पर, जिसे हटाकर निश्चय ही भारत माता को गर्व से मुस्कराने का मौका दिया है केंद्र सरकार ने। किसी भी लोकतांत्रिक देश में कानून एक होना चाहिए। बहरहाल, अब ऐसे प्रयास किए जाने चाहिए कि इसका अंतरराष्ट्रीय मामले पर नकारात्मक असर न पड़े, तभी अनुच्छेद हटाए जाने का मतलब साकार होगा। (विकास पंडित, बड़वानी, मध्य प्रदेश)

कानून का भय 
आज हर तरफ मॉब लिंचिंग की घटनाएं जिस तरह से बढ़ रही हैं, उससे ऐसा लगता है कि कानून का भय अब लोगों में नहीं रहा। ऐसी घटनाएं यह भी दिखाती हैं कि लोगों में इंसानियत की भावना खत्म हो चुकी है। किसी भी व्यक्ति को केवल अफवाह व शक के आधार पर पकड़ना और उसे सरेआम सजा देना किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए ठीक नहीं। अगर कोई व्यक्ति सचमुच गुनहगार है, तो उसके लिए कानून बना है। आज जिस तेजी के साथ फेक न्यूज और अफवाहें फैल रही हैं, उससे हर आदमी को सचेत रहना जरूरी है। किसी भी मैसेज पर तुरंत विश्वास करना ठीक नहीं है। अगर हो सके, तो उसे शेयर करने से बचें। एक आदर्श समाज कानून से ही चलता है। ऐसे में कुछ लोगों को पशुता का परिचय नहीं देना चाहिए। (निकुंज कुमार, बक्सर)

श्रम सुधार की दरकार
हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारत के तेज आर्थिक विकास के लिए जरूरी है कि वह श्रम सुधार करे। इस परिप्रेक्ष्य में भारत श्रम सुधारों की डगर पर आगे बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। 23 जुलाई को सरकार ने इस बाबत संसद में दो अहम प्रस्ताव भी पेश किए। ये प्रस्ताव वेतन विधेयक संहिता- 2019 और पेशेगत स्वास्थ्य सुरक्षा और कार्य की स्थिति संहिता- 2019 से संबंधित हैं। उल्लेखनीय है कि इन दिनों देश ही नहीं, पूरी दुनिया की निगाहें भारत की नई श्रम संहिता (लेबर कोड) पर लगी हुई हैं। विगत 5 जुलाई को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट पेश करते हुए कहा था कि सरकार 44 श्रम कानूनों को मिलाकर चार श्रम संहिताएं बनाएगी। ये संहिताएं न्यूनतम वेतन और कार्यगत सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य-दशा, सामाजिक सुरक्षा और औद्योगिक संबंधों पर केंद्रित होंगी। इस तरह के प्रयास जरूरी हैं, तभी देश में कार्य-स्थल का माहौल बदलेगा। (सूर्यभानु बांधे, रायपुर,  छत्तीसगढ़)

कुपोषित संतानें
तीव्र आर्थिक वृद्धि के बावजूद भारत में कई दशकों से कुपोषण एक प्रमुख सामाजिक-आर्थिक चुनौती के रूप में मौजूद है। विश्व में सबसे ज्यादा कुपोषण के शिकार बच्चे हिन्दुस्तान में हैं। कुपोषण का सीधा मतलब है कि खाने के लिए भोजन नहीं है। नीति आयोग के मुताबिक, जिन पांच राज्यों में सबसे ज्यादा बच्चे ‘अंडरवेट’ हैं, उनमें पहले नंबर पर झारखंड, दूसरे पर बिहार, तीसरे पर मध्य प्रदेश, चौथे पर उत्तर प्रदेश और पांचवें पर गुजरात है। यह स्थिति तब है, जब देश तेजी से विकास कर रहा है। साफ है कि कहीं न कहीं नीतिगत गड़बड़ियां जरूर हैं, जिस कारण देश की संतानें कुपोषित हैं। इस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है, वरना आने वाले दिनों में स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है। (प्रियंबदा, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Hindustan Mail Box Column on 6th August