Hindustan Mail Box Column on 3rd August - काबुल में नई करवट DA Image

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काबुल में नई करवट

शुक्रवार को प्रकाशित विवेक काटजू का लेख ‘काबुल में नई करवट के बाद’ पढ़ा। लेखक ने सही लिखा है, और अमेरिका भी सही कर रहा है। उसके लिए अपने नागरिक सर्वोच्च हैं, तो वह यही करेगा। राष्ट्रों में भावनात्मक संबंध नहीं होते, बल्कि रणनीतिक रिश्ते होते हैं। मगर हम भारतीय कभी रूस, तो कभी अमेरिका को अपना हितैषी मान बैठते हैं, जबकि वे अपना हित देख रहे होते हैं। इसीलिए भारत को अपना रास्ता खुद ढूंढ़ना पड़ेगा। कोई राष्ट्र किसी का स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता, बल्कि अपने हितों का पोषक होता है। जब तक हम खुद को इतना मजबूत नहीं बना लेंगे कि किसी को भी टक्कर दे सकें, तब तक हमें कोई नहीं पूछेगा। हमें इसी संदर्भ में अपनी रणनीति बनानी चाहिए। (दीपक तिवारी)

हड़ताल नहीं है समाधान
जब कोई बड़ा बदलाव होता है, तो उसके पक्ष-विपक्ष में लोग खड़े होते ही हैं। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग विधेयक का विरोध भी देश भर में डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों द्वारा किया जा रहा है। चिकित्सक हड़ताल पर हैं। वे आपातकालीन विभाग में भी अपनी सेवाएं नहीं दे रहे। इस बिल में जो प्रावधान किए गए हैं, वे चिकित्सा की गुणवत्ता को ध्यान में रखकर ही किए गए हैं। डॉक्टरों की आपत्ति इस प्रावधान पर है कि ब्रिज कोर्स के बाद आयुर्वेद और होम्योपैथ डॉक्टर भी एलोपैथिक उपचार कर सकेंगे। ऐसे वक्त में, जब देश में, खासतौर से ग्रामीण भारत में, योग्य डॉक्टरों की भारी कमी है, तब इस प्रावधान से यदि प्रशिक्षित डॉक्टर गांवों-कस्बों में उपलब्ध हो जाते हैं, तो मरीजों को काफी राहत मिलेगी। लेकिन इन सब बातों को समझने की बजाय डॉक्टर हड़ताल पर हैं। ऐसा करने की बजाय डॉक्टरों को सही माध्यम से अपनी मांगें सरकार के सामने रखनी चाहिए। (मुकेश पांडे)

संकट में अर्थव्यवस्था
विश्व बैंक द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत की अर्थव्यवस्था 27.3 खरब डॉलर के साथ 2018 में विश्व की सातवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनी, जबकि 2017 में वह छठे पायदान पर थी। जहां एक ओर सरकार 50 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही है, वहीं विश्व बैंक के आंकड़े राह में कांटे की तरह लगते हैं। इस गिरावट के कई कारण हैं। जैसे, किसानों को खाद्यान्न फसलों की उचित कीमत न मिलने से उत्पादन में कमी, विनिर्माण क्षेत्र में मंदी, चालू खाते का घाटा बढ़ना, चुनावी वर्ष इत्यादि। सच यह भी है कि ये सभी कारण अस्थाई प्रकृति के हैं, जिनका निवारण सुगम है। वैसे भी, लोकतंत्र में विशाल बहुमत बड़ी जिम्मेदारी और बड़ी अपेक्षाएं लेकर आता है, इसीलिए सरकार जनादेश से जुड़ी उम्मीदें पूरी करे और अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक सुधार लाकर अपने लक्ष्य की ओर तेज कदम बढ़ाए। (कपिल एम वड़ियार, पाली, राजस्थान)

पीड़िता को इंसाफ
करीब दो साल से इंसाफ की लड़ाई लड़ रही उन्नाव रेप पीड़िता आज मौत से लड़ रही है। उस इज्जत के लिए वह लड़ रही है, जिसे सत्ता पर काबिज कुछ लोगों ने सरेआम बेइज्जत कर दिया था। 16 दिसंबर, 2012 के बाद देश भर में जो गुस्सा फैला, उससे उम्मीद जगी थी कि इस तरह की हैवानियत के खिलाफ अब सारा देश आवाज उठाएगा। मगर वह सपना पूरा नहीं हो सका। उन्नाव रेप पीड़िता ने प्रधान न्यायाधीश को लिखे पत्र में बताया कि उसे जान का खतरा है और उस पर केस वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है। मगर यह पत्र गंतव्य तक पहुंचने नहीं दिया गया, बल्कि इस बीच पीड़िता सड़क हादसे का शिकार बन गई। साफ है, आम आदमी की आवाज आज भी दबाई जा रही है। अब भी तस्वीर नहीं बदली, तो हैरत नहीं कि आगे भी ऐसी घटनाएं देखने-सुनने को मिलें। (मनाली कुमारी)

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