Hindustan Mail Box Column on 31st August - पॉलीथिन पर पाबंदी DA Image

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पॉलीथिन पर पाबंदी

स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पॉलीथिन पर पाबंदी लगाने की घोषणा से देश में इसकी उत्पादक इकाइयों पर प्रतिकूल असर पड़ा है। इस कारोबार में लगे लोगों और कर्मचारियों को रोजगार की और मालिकों को अपनी पूंजी की चिंता सताने लगी है। प्रधानमंत्री की इस घोषणा से हर तरफ अजीब सी खलबली मची हुई है। जनता, कर्मचारी और इन इकाइयों के मालिक, सभी लोग आशंकित हैं, क्योंकि बिना पूर्व प्रबंध के यह सब इतना उचित और संभव नहीं लगता। इसके लिए पहले से ढेर सारे इंतजाम करने होंगे। महज एक झटके में यह कार्य संभव नहीं है, क्योंकि इससे देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पडे़गा। आज जब देश की आर्थिक हालत कमोजर है, तब मोदी सरकार से अपेक्षा है कि वह उचित विचार-विमर्श करके ही इस आगे बढ़ेगी। (महेंद्र मान, अलीपुर, दिल्ली)

एक बेहतरीन प्रयास
केंद्र सरकार ने देश में 75 नए मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा की है। इस फैसले से आने वाले दिनों में एमबीबीएस की 15 हजार से अधिक सीटें बढ़ेंगी। इस तरह, देश में डॉक्टरों की संख्या बढ़ेगी और स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं में सुधार होगा। हालांकि सिर्फ इससे बात नहीं बन सकती। सरकार को निरंतर मेडिकल कॉलेज खोलने होंगे, ताकि देश में मेडिकल सीटें बढ़ सकें और देश में डॉक्टरों की कमी न हो। एक अनुमान के अनुसार, देश में एक लाख मेडिकल सीटों की जरूरत है। देश में जितने मेडिकल कॉलेज बनेंगे, उतना ही स्वास्थ्य सेवाओं का विकास होगा। फिट इंडिया अभियान को आगे बढ़ाने और आयुष्मान भारत योजना के सफल बनाने में इन मेडिकल कॉलेजों की भूमिका काफी अहम हो सकती है। (विजय किशोर तिवारी, नई दिल्ली)

बिगड़ती आर्थिक सेहत
भारतीय समाज में एक जुमला बहुत प्रसिद्ध है कि जब किसी घर का मुखिया अपने बच्चों का गुल्लक तोड़कर उससे घर खर्च चलाने पर मजबूर हो जाए, तो समझो कि उस घर की हालत बहुत खस्ता हो चली है। ठीक ऐसी ही हालत हमारे देश की भी हो चली है, तभी तो इस देश के मुखिया आरबीआई रूपी गुल्लक को तोड़कर उसमें से 1.76 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए, जबकि यह रकम किसी आकस्मिक संकट के लिए संचित राशि के रूप में रखी हुई थी। दरअसल, पिछले पांच साल से इस देश के गरीबों और आम जनता की मूल समस्याओं को बड़ी चतुराई से नेपथ्य में धकेलकर अनावश्यक मुद्दों को आगे किया गया और देश की अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया गया। अब तो आशंका यह भी जताई जाने लगी है कि इस देश की हालत निकट भविष्य में दुनिया के निर्धनतम और दिवालिया राष्ट्र जैसी न हो जाए! हमें सचेत रहना चाहिए। (निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद)

एनआरसी से जुड़े सवाल
शुक्रवार को सुदीप चक्रवर्ती ने असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की अंतिम सूची जारी करने के बाद की कुछ चुनौतियों का विश्लेषण किया है। असम सरकार की यह पहल प्रशंसनीय मानी जा सकती है कि उसने गैर-भारतीयों की पहचान की पहल की, लेकिन लाखों की संख्या में असम में गैर-भारतीयों के आंकड़े ने सबको चकित कर दिया और देश के सुरक्षा तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया। यह तो वक्त ही बताएगा कि आज जारी हो रही अंतिम सूची के बाद असम में जो लोग गैर-भारतीयों की सूची में रह जाएंगे, वे अपनी भारतीय नागरिकता कैसे सिद्ध करेंगे और जो साबित नहीं कर पाएंगे, उनके लिए सरकार क्या नीति अपनाएगी, लेकिन असम में भारी संख्या में गैर-भारतीयों की पहचान होना भारत के सुरक्षा तंत्र की पोल तो खोलता ही है। सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को असम में गैर-भारतीयों पर कड़ी नजर रखनी होगी। यह मुश्किल काम साबित होगा। (राजेश कुमार चौहान, जालंधर)

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