Hindustan Mail Box Column on 30th July - घाटी में हलचल DA Image

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घाटी में हलचल

केंद्र सरकार का यह बहुत ही स्वागतयोग्य फैसला है। घाटी में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती से वहां पर आम लोगों के अंदर सुरक्षा और विश्वास की भावना पैदा होगी। मगर इससे कुछ नेताओं को परेशानी हो रही है। वे बिना सिर-पैर की बातों से वहां की जनता को गुमराह कर रहे हैं। उनको यह समझ में नहीं आ रहा है कि वे क्या करें, इसीलिए उन्होंने इसे आर्टिकल-35 ए से जोड़ दिया है। कहा यह भी जा रहा है कि यह कदम ‘बारूद को हाथ लगाने जैसा होगा, जिसमें हाथ ही नहीं, जिस्म भी जलकर राख हो जाएगा’। मगर असलियत में केंद्र सरकार घाटी में विश्वास का माहौल बनाना चाहती है, जो अभी अलगाववादियों और आतंकवादियों की गतिविधियों की वजह से संभव नहीं दिख रहा। निश्चित तौर पर केंद्र सरकार के इस कदम से कश्मीर घाटी में शांति स्थापित हो सकेगी। (अखिलेश कुलश्रेष्ठ, गाजियाबाद)

महिला समाज का अपमान
संसद में महिला सदस्य का अपमान असल में पूरे महिला समाज का अपमान है। इतने बड़े पद पर आसीन एक महिला सांसद की गरिमा से खिलवाड़ शर्मनाक है। समाज में पुरुष सदियों से स्त्रियों का अपमान करता आया है। आखिर क्यों औरत की गरिमा की रक्षा पुरुष समाज नहीं करता है? क्यों उन्हें आदर नहीं दिया जाता है? कहां गया कानून, कहां गई सुरक्षा? एक आम महिला कैसे अपनी रक्षा कर सकेगी, जब संसद में ही महिला की गरिमा तार-तार की जा रही हो? आखिर हमारा समाज यह क्यों बार-बार भूल जाता है कि जहां नारी की पूजा होती है, वहीं पर देवता निवास करते हैं। (सुमन मलिक, न्यू आर्य नगर, मेरठ)

दम तोड़ता आरटीआई
सूचना का अधिकार कानून लागू हुए एक दशक बीत चुका है। आम जन की भागीदारी और जागरूकता ने इस कानून की सफलता के ग्राफ को निरंतर ऊपर उठाने का काम किया। इस कानून को लाने का मकसद शासन-प्रशासन में पारदर्शिता लाना और उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करना था। आम आदमी भी इस अचूक हथियार का इस्तेमाल करके सरकारी मशीनरी में व्याप्त भ्रष्टाचार को कम करने और लोगों के प्रति उसकी जवाबदेही तय करने में काफी हद तक सफल रहा। इस कानून की सफलता की एक बड़ी वजह केंद्रीय और राज्य सूचना आयुक्तों को दी गई स्वायत्तता थी, लेकिन हालिया आरटीआई संशोधन बिल के जरिए केंद्रीय और राज्य सूचना आयुक्तों के कार्यकाल व वेतन-भत्तों के निर्धारण की शक्ति केंद्र सरकार को सौंप दी गई है। ऐसा करके आम जनमानस के इस एकमात्र हथियार की धार को कुंद करने का प्रयास किया गया है। इसका दुष्प्रभाव निश्चित रूप से आने वाले समय में देखने को मिलेगा। (संदीप उनियाल, देहरादून)

गलत के खिलाफ 
इन दिनों प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखने का मुद्दा गरम है। देश में हो रही मॉब लिंचिंग के विरोध में 49 बुद्धिजीवियों ने चिट्ठी लिखी, तो उस चिट्ठी के विरोध में अन्य 62 बुद्धिजीवियों ने भी चिट्ठी लिखी। सभी अपने-अपने चश्मे से चीजों को देख रहे हैं। लेकिन पिछले एक-डेढ़ साल से भीड़ द्वारा जो ‘न्याय’ किया जा रहा है, वह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं लगता। इसमें मासूम और निर्दोष लोग बलि का बकरा बन रहे हैं। चूंकि भीड़ के पास न तो सोचने और समझने की बुद्धिमत्ता होती है और न यह अधिकार कि वह न्याय कर तत्काल सजा दे। इसीलिए अनुचित हो रही इस हिंसा को रोकने का काम केंद्र व राज्य सरकारों को करना चाहिए। लेकिन पढ़ने-सुनने में आ रहा है कि इस तरह की घटनाएं कम होने की बजाय उत्तरोतर बढ़ती जा रही हैं, जो कानून और व्यवस्था पर बदनुमा दाग है। ऐसे में, यह समझ से परे है कि मात्र चिट्ठी लिख देने से छवि कैसे खराब हो गई? (हेमा हरि उपाध्याय, उज्जैन)

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