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कोयले पर मेहरबान

अक्षय और नवीन ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने के वैश्विक संकल्पों के इतर सरकार अब भी कोयले पर ही दांव खेल रही है। ग्लोबल वार्मिंग और कार्बन उत्सर्जन का सबसे बड़ा कारण कोयला होने के बावजूद केंद्र सरकार ने बजट में अक्षय ऊर्जा के मुकाबले कोयला मंत्रालय को ज्यादा रुपये आवंटित किए। जहां एक तरफ संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन संबंधी समिति ने वर्ष 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में 35 प्रतिशत कमी, अक्षय ऊर्जा में 40 प्रतिशत बढ़ोतरी का लक्ष्य रखा है, तो वहीं दूसरी तरफ हमारी सरकार अक्षय ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना को लेकर उदासीन दिख रही है। अत: सरकार से उम्मीद है कि वह सोलर मॉडल्स पर आयात शुल्क कम करे, कर की दर कम करे, जीएसटी से विशेष राहत दे और अक्षय ऊर्जा बजट को बढ़ाए, ताकि भारत भी वैश्विक जिम्मेदारियों पर खरा उतर सके। 
कपिल एम वड़ियार, राजस्थान

यह कैसा शौक
वर्षा ऋतु में नदी-नाले उफान पर रहते हैं। लेकिन सेल्फी के शौकीन लोग नदी-नालों के किनारे जाकर या पुल के ऊपर खडे़ होकर सेल्फी लेते हैं, जबकि इन जगहों पर जान जाने का खतरा बना रहता है। दरअसल, नदी-नालों के किनारे तेज बहाव में धंस जाते हैं और पुल पर पानी अचानक बढ़ सकता है। प्रशासन द्वारा इन्हें रोकने की व्यवस्था की जाती है, किंतु सेल्फी लेने वाले मनाही के बाद भी जोखिम लेने से बाज नहीं आते। ऐसे लोगों को परिवारी जनों द्वारा समझाने की जरूरत है, ताकि हादसे टाले जा सकें। 
संजय वर्मा, मनावर, धार

दुष्प्रचार बंद हो 
चंद दिनों पहले नीति आयोग के उपाध्यक्ष द्वारा भारत की अर्थव्यवस्था के बारे में प्रतिकूल टिप्पणी की गई थी। हालांकि बाद में वह अपने बयान से पलट गए, लेकिन विपक्ष को तो एक मुद्दा मिल गया। उसने तो देश की अर्थव्यवस्था को आईसीयू तक में कह डाला। हां, यह सही है कि कुछ निजी कंपनियों द्वारा अपने कर्मचारियों की छंटनी की गई है, लेकिन उसके आधार पर यह कह देना कि देश की अर्थव्यवस्था अभूतपूर्व मंदी के दौर से गुजर रही है, गलत जान पड़ता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि कर्मचारियों की छंटनी और अर्थव्यवस्था की रफ्तार के कम होने के कतिपय कारण हैं। वर्तमान दौर में जब किसी भी देश की अर्थव्यवस्था स्थानीय कारकों से ज्यादा वैश्विक कारकों पर निर्भर हो चुकी है, तब आर्थिक सुस्ती की जवाबदेही वर्तमान सरकार पर मढ़ देना राजनीतिक प्रतिशोध के अलावा कुछ नहीं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रेड वार, खाड़ी देशों में अस्थिरता, अमेरिका जैसे देशों में बढ़ती बेरोजगारी जैसे मुद्दे वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं। यह बात एक सामान्य बुद्धिजीवी भी समझ सकता है, लेकिन विरोधियों को यह बात समझ में नहीं आती। अब आम लोग ही आगे आकर मोदी सरकार के खिलाफ चल रहे इस दुष्प्रचार का विरोध करें।
शिवानंद झा, आईआईटी, पटना

तेज रफ्तार पर अंकुश
बहुत तेज रफ्तार विनाशक होती है, चाहे वह जिंदगी की हो या गाड़ियों की। प्रतिदिन कोई न कोई व्यक्ति हादसे का शिकार बनता ही है, कभी-कभी तो कई मौतें एक साथ एक ही घर की देखने-सुनने को मिलती हैं। कारण है, गाड़ी की बेतहाशा रफ्तार। गाड़ियों की तेज गति पर अंकुश लगना बेहद जरूरी है। सभी को अपने गंतव्य तक पहुंचना है, पर एक-दूसरे को मौत के घाट उतारकर नहीं। ट्रैफिक पुलिस, प्रशासन, सरकार क्या कर रही है और क्या नहीं, इससे ज्यादा जरूरी है खुद पर संयम रखना, दूसरे की भी परवाहकरना। अपने स्वार्थ में अंधे होकर अंधाधुंध रफ्तार से गाड़ी चलाना किसी दूसरे को मौत की सौगात दे सकता है। इसलिए तेज रफ्तार पर रोक जरूरी है।
माधुरी शुक्ला, सारनाथ, वाराणसी
 

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