Hindustan Mail Box Column on 28th August - अभियान की हकीकत DA Image

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अभियान की हकीकत

सरकार और उसके नुमाइंदों ने स्वच्छ भारत अभियान को अपनाकर जनता तक लाने में जो दमखम दिखाया, वह वाकई सराहनीय था। सरकार ने अरबों रुपये इस योजना को सफल बनाने में खर्च कर दिए, परंतु क्या वास्तव में हम अपने लक्ष्य को पा सके? अन्य प्रदेशों की बात छोड़ दीजिए, मगर उत्तर प्रदेश में ही जिस तरह सरकारी कारिंदों ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई, वह बहुत ही शोचनीय है। जिस योजना की सफलता से राज्य की जनसंख्या के स्वास्थ्य और जीवन पर सीधा असर पड़ता है, उसी को अनदेखा किया जा रहा है। भारी रकम खर्च करने के बाद भी नतीजा सिफर है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां आज भी 80 प्रतिशत जनता खुले में शौच जाती है। अत: सरकार को इस योजना की पुन: समीक्षा करनी चाहिए और कड़ाई से इसे लागू करना चाहिए। (जसबीर सिंह सिसोदिया)

पेट भरें या पर्यटन करें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय जनता से आग्रह किया है कि देश की डूबती अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने, रोजगार पैदा करने और पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों की आमदनी बढ़ाने के लिए वे 2022 तक देश के महत्वपूर्ण 15 प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों की यात्रा जरूर करें। प्रधानमंत्री का यह सुझाव बहुत अच्छा है, परंतु समय सापेक्ष नहीं है। वास्तव में, हमारी सरकारों द्वारा भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति, हजारों की संख्या में देश भर में फैले मंदिरों, किलों, महलों, मीनारों, बावड़ियों, विजय स्तंभों आदि प्राचीन पुरातात्विक धरोहरों के सौंदर्य को संरक्षित करने और उनका प्रचार-प्रसार करके दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करने का कभी भी गंभीरतापूर्वक प्रयास नहीं किया गया, जबकि यूरोप के छोटे-छोटे देश सांस्कृतिक धरोहरों के मामले में हमारी तुलना में नगण्य होते हुए भी मीडिया के बल पर पर्यटन उद्योग में हमसे ज्यादा विदेशी मुद्रा अर्जित कर रहे हैं। फिर, आज जब लोगों की आमदनी सिमट गई है, रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं और लोगों के सामने रोजी-रोटी के लाले हैं, तब प्रधानमंत्री द्वारा पर्यटन की सलाह देना एक मजाक लगता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि भूखा आदमी सबसे पहले अपनी भूख मिटाने का उद्यम करेगा, न कि घूमने जाएगा। (निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद)

प्लास्टिक मुक्त भारत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से अपील की है कि वे महात्मा गांधी की 150वीं जयंती को भारत को प्लास्टिक मुक्त बनाने के दिवस के रूप में मनाएं। निस्संदेह, यह बहुत ही आवश्यक और पर्यावरण हितैषी कदम है। आज के समय में प्लास्टिक का सुबह उठने से रात सोने तक विभिन्न तरीकों से प्रयोग किया जाता है। नतीजतन, कभी न खत्म होने वाले प्लास्टिक कचरे हर जगह बिखरे दिखते हैं। चूंकि देश का कोई भी कार्य बिना जन-सहयोग के संभव नहीं है, इसलिए यह बहुत जरूरी है कि प्लास्टिक का बहिष्कार कर हम अपने कर्तव्य को पूरा करें। (कविता वर्मा, बुलंदशहर)

यमुना मांगे हक
इतने वर्षों बाद भी यमुना अपनी जिंदगी की लड़ाई लड़ रही है। समय-समय पर कई योजनाएं बनने के बावजूद इस नदी में सुधार के निशान नहीं दिखते। लोकसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, यमुना की सफाई में 25 वर्षों में 1,514 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। इसमें गलती हम सबकी है। दरअसल, सरकारी तंत्र व प्रशासन का काम है पहल करना, लेकिन उसका पालन करना हम लोगों का ही काम है। आज भी यमुना में कई नालों का पानी गिरता है। एनजीटी के आदेश के बावजूद यमुना की सफाई को अनदेखा किया जा रहा है। ऐसे वक्त में, जब देश में जल संकट गहरा रहा है, तब यह बहुत जरूरी है कि हम अपनी नदियों की देखभाल करें। (आशीष, दिल्ली विश्वविद्यालय)

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