Hindustan Mail Box Column on 27th July - अपराध मुक्त समाज DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

अपराध मुक्त समाज

उच्चतम न्यायालय ने पॉक्सो के तहत दर्ज मामलों में सख्ती दिखाते हुए सुनवाई में तेजी लाने के लिए केंद्र सरकार को निर्देश दिया है। कहा है कि जिन जिलों में 100 से ज्यादा केस लंबित हैं, वहां 60 दिनों में स्पेशल पॉक्सो कोर्ट बनाया जाए। अभी दो दिन पहले संसद से पॉक्सो संशोधन बिल भी पास हुआ है। बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराध को कम करने और दोषियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने के लिए ऐसे सख्त कदम उठाने जरूरी थे। देखा यही गया है कि देश में कानून तो बन जाते हैं, मगर उनका उचित क्रियान्वयन नहीं हो पाता है, जिस कारण अपराध पर अंकुश नहीं लग पाता। देश भर में बच्चों के यौन शोषण के 24 हजार से अधिक मामले इसी साल जनवरी से जून के बीच दर्ज किए गए हैं, जिनमें से तीन हजार से अधिक मामले उत्तर प्रदेश से हैं। यह चिंता की बात है। इन अपराधों से निपटने के लिए जागरूक समाज की सख्त दरकार है। (मोहम्मद आसिफ, जामिया नगर, दिल्ली)

मां का नाम
दिल्ली विश्वविद्यालय भारत का एक प्रमुख केंद्रीय विश्वविद्यालय है, जहां हर वर्ष हजारों की संख्या में छात्र-छात्राएं विभिन्न पाठ्यक्रमों में अपनी शिक्षा पूरी करके उपाधि ग्रहण करते हैं। आश्चर्य यह है कि उपाधि-पत्र में पिता का नाम तो लिखा होता है, पर मां का नाम दर्ज नहीं होता, जबकि दसवीं-बारहवीं के शैक्षणिक दस्तावेजों में मां का नाम भी लिखा होता है। यहां तक कि जब कॉलेज में दाखिले के लिए रजिस्ट्रेशन फॉर्म भरे जाते हैं, तो उनमें भी मां का नाम भरना पड़ता है। इन सभी दस्तावेजों में मां का नाम होने के बावजूद जब दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन छात्र-छात्राओं को उपाधि बांटता है, तो उसमें मां का नाम क्यों नहीं दर्ज किया जाता? उपाधि-पत्र से मां का नाम वंचित क्यों रखा गया है? दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन को इस विषय पर ध्यान देना चाहिए और उचित कदम उठाना चाहिए। (विजय कुमार धनिया, नई दिल्ली)

रोकने की साजिश
पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में आदिवासियों की जमीन हड़पने के लिए जिस प्रकार सुनियोजित ढंग से लोगों की नृशंसतापूर्वक हत्या की गई और अब वहां विपक्षी दल के नेताओं को जाने से रोका जा रहा है, उससे इस बात को बल मिलता है कि यह घटना मात्र संयोग नहीं है। यह आदिवासियों और दलितों के विरुद्ध एक सुनियोजित साजिश है। इस बात को बल इसलिए भी मिल रहा है, क्योंकि प्रदेश सरकार के एक जिम्मेदार मंत्री ने यह बयान दिया कि आदिवासियों और दलितों को भला जमीन-जायदाद से क्या काम? इनका मुख्य काम तो साफ-सफाई करके समाज की सेवा करना है। ऐसी अनर्गल बयानबाजी ठीक नहीं है। किसी दुखद घटनास्थल पर जाने से ‘किसी’ को रोककर भला किस तरह की लोकतांत्रिक मर्यादा और गरिमा का पालन किया जा रहा है? कहीं न कहीं दाल में काला जरूर है, इसलिए घटनास्थल पर जाने से रोका जा रहा है। (निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद)

मिलावटखोरों के खिलाफ
खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वाले देश और समाज के दुश्मन हैं। वर्तमान में दूध में मिलावट की कई घटनाएं उजागर हुई हैं। दूध से बने विभिन्न उत्पाद और मिठाइयां भी निरापद नहीं रही हैं। नामचीन कंपनियों के दूध के सैंपल भी मानक पर खरे नहीं पाए गए हैं। सिंथेटिक दूध के हानिकारक प्रभाव से लाखों देशवासी तरह-तरह की जानलेवा बीमारियों से जूझ रहे हैं। धीमा जहर हमें मृत्यु की ओर ले जा रहा है। संबंधित विभागों को मिलावटखोरों के खिलाफ सतत कार्रवाई करनी चाहिए। मिलावट करना गैर-जमानती अपराध घोषित किया जाना चाहिए। मिलावट करने वालों के विरुद्ध विशेष अदालतों में मुकदमे चलने चाहिए और उन्हें सख्त सजा दी  जानी चाहिए। (ललित महालकरी, इंदौर)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Hindustan Mail Box Column on 27th July