Hindustan Mail Box Column on 26th August - पर उपदेश कुशल... DA Image

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पर उपदेश कुशल...

पिछले दिनों अमेरिका ने जमीन से जमीन पर 5,000 किलोमीटर तक मार करने वाली टामहक क्रूज मिसाइल का परीक्षण करके विश्व को एक और अनावश्यक युद्धक सामान बनाने के लिए मजबूर करने वाला ‘कुकृत्य’ किया है। अमेरिका की कथनी और करनी में बहुत फर्क है। वह चाहता है कि दुनिया के अन्य सभी देश, उदाहरण के लिए, भारत, उत्तर कोरिया, ईरान आदि अपने रक्षार्थ भी हथियार न विकसित करें, इसके लिए वह उन पर तरह-तरह के आर्थिक दंड लगाता रहा है, परंतु वह खुद अत्यंत घातक हथियारों का जखीरा रखने के बावजूद नए-नए हथियार बनाने में जुटा रहता है। कितना अच्छा होता, अमेरिका और अन्य देश हथियारों पर होने वाले अकूत धन को मानव कल्याण के कार्यों पर खर्च करते। विश्व के सभी लोग शांति और अमन से अपना जीवन गुजारते! परंतु बहुत अफसोस की बात है कि कई देश ऐसे हैं, जो इंसानों को चैन से नहीं जीने देते। संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था भी अमेरिका जैसे देश की ‘जेबी संस्था’ बनकर रह गई है। इस भयावह स्थिति का विकल्प ढूंढ़ा ही जाना चाहिए। (निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद)

नदियों की चिंता
भारत में नदियों की ज्यादा चिंता करने की जरूरत है। यदि हम अपनी नदियों को ठीक से नहीं रख पाए, तो इससे बुरी कोई और बात नहीं होगी। भारत को नदियों के रखरखाव के मामले में आदर्श देश बनना चाहिए था, क्योंकि शायद यही वह देश है, जहां नदियों की पूजा होती है। नदियों के तटों पर तमाम तीर्थ बसे हैं। नदियां न हों, तो भारतवर्ष की कल्पना कठिन है। सरकार को युद्ध स्तर पर नदियों की सफाई का काम अपने हाथों में लेना चाहिए और इसके परिणाम जमीन पर दिखने भी चाहिए। (रमेश कुमार, दिलशाद गार्डन)

मंदिर और मूर्ति विवाद
अभी दिल्ली में रविदास मंदिर को कोर्ट के आदेश पर तोड़ने से पैदा हुए बवाल और तोड़-फोड़ में जन संपत्ति की हानि के साथ आम जनता को भी परेशानी हुई है। इसी तरह, दिल्ली विश्वविद्यालय में भी डूसू नेताओं द्वारा बिना अनुमति मूर्ति लगाने पर एक अन्य विवाद अलग चल रहा है। मूर्तियां निश्चित ही आस्था, पूजा-पाठ और विश्वास की प्रतीक हैं। मगर इनकी पवित्रता कायम रखने के लिए इन्हें उचित स्थान पर सर्वसहमति से स्थापित करना ही यथोचित है। आज कुछ लोगों ने धर्म के नाम पर बड़ा धंधा ही कर लिया है और वे कहीं भी सरकारी जमीन या सड़क पर ही धर्मस्थल निर्माण कर लेते हैं। यह प्रशासन की साफ कमजोरी है। आज शायद देश में मंदिर-मस्जिद शायद स्कूलों से भी कहीं अधिक हैं और असंख्य साधु-संतों, मौलाना-मौलवियों के होने के बाद भी हमारा किस कदर चारित्रिक पतन हो चुका है, बताने की जरूरत नहीं है। आज हम असली धर्म-कर्म छोड़कर शायद किसी गलत मार्ग पर हैं। विद्या के असली मंदिर तो हमारे स्कूल हैं, जिनमें आज मानवीय शिक्षा का घोर अभाव है। ईश्वर तो सर्वव्यापी है और वह हर जीव में है, इसलिए इसी बात को समझकर दया भाव से ही जीवन में आगे बढ़ने की जरूरत है। (वेद मामूरपुर, नरेला)

आधार से खिलवाड़
केंद्र सरकार को भारतीय पहचान के दस्तावेज आधार की चिंता करनी चाहिए। आज के समय में लगभग हर कंपनी अपने ग्राहक से आधार मांगने लगी है। बार-बार मांगकर लोगों को इसके लिए मजबूर किया जाता है। आधार के डाटा के दुरुपयोग की गुंजाइश न हो, तो कोई बात नहीं, लेकिन यहां तो लोगों के फोन नंबर तक सुरक्षित नहीं हैं। ये नंबर और उसके धारक के नाम बेच दिए जाते हैं। डाटा की बिक्री होती है। अत: व्यक्तिगत गोपनीयता का सम्मान करते हुए डाटा की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखते हुए आधार को मजाक बनने से बचाना चाहिए। उम्मीद है, सरकार इस दिशा में गंभीर पहल कर लोगों को चिंतामुक्त करेगी। (अनुपम सिन्हा, सतना, मध्य प्रदेश) 

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