Hindustan Mail Box Column on 24th August - अच्छे संकल्प जरूरी DA Image

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अच्छे संकल्प जरूरी

हमारे देश में समय-समय पर हर धर्म के अनेक पर्व-त्योहार मनाए जाते हैं। हर धर्म के पर्व-त्योहार प्यार, इंसानियत से जीने का संदेश देते हैं। अहंकार और गलत आदतों से दूर रहना सिखाते हैं। इन्हीं त्योहारों में से एक त्योहार है जन्माष्टमी, जो कि भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। श्रीकृष्ण ने जो गीता में संदेश दिए थे, अगर हर इंसान उनका अनुसरण करे और उस रास्ते पर चले, तो इंसान न खुद कभी दुखी हो सकता है और न ही अपने गलत कर्मों से दूसरों के दिल को दुखी कर सकता है। आज जिस तरह दुनिया में स्वार्थ, बैर-विरोध, नफरत की आंधी चल रही है, उसके लिए तो अब और भी जरूरी हो गया है कि गीता में लिखे संदेशों का खूब प्रचार हो, इसके लिए धर्मगुरुओं को आगे आना चाहिए। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन सभी को मन में अच्छी बातें ग्रहण करने और उन पर चलने का प्रण लेना चाहिए, ताकि समाज में शांति रहे, अच्छा माहौल बना रहे। (राजेश कुमार चौहान, 20 बी, हरगोबिंद नगर, जालंधर)

अब कब चेतेंगे
आज का समय पूर्णत: भौतिकवादी है, लेकिन इंसान को इतना अधिक स्वार्थी नहीं होना चाहिए कि वह राष्ट्र और पर्यावरण के प्रति अपने कर्तव्यों को बिल्कुल ही भुला दे। जहां आज पूरा विश्व बिगड़ते पर्यावरण को लेकर गंभीर है, वहीं हमारे भारतवासी आस्था की आड़ में पर्यावरण के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। वर्तमान सरकार ने अवश्य बिगड़ते पर्यावरण को लेकर गंभीरता दिखाई है, बस लोगों को साथ देना चाहिए। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण आज सैंकड़ों माध्यमों से बढ़ रहे हैं। जल प्रदूषण के तहत हम नदियों में बढ़ते प्रदूषण को नकार नहीं सकते। हमारी अंधी आस्था ने आज नदियों को मैला ढोने वाला नाला बना दिया है। प्रकृति द्वारा दिए जा रहे खतरनाक संकेतों को यदि हम अब नहीं समझ पाए, तो आने वाली हमारी पीढ़ियों के पास भवन होंगे, कारें होंगी, पर अफसोस सांस लेने के लिए शुद्ध हवा और पीने के लिए शुद्ध पानी नहीं होगा। अब न चेते, तो कब चेतेंगे? (मनदीप सिंह, मियांपुर, मोहम्मदी, खीरी)

भ्रष्टाचार के खिलाफ
आम तौर पर राजनीतिक घपले-घोटाले का कोई मामला सामने आने पर कठघरे में खड़े नेता पहले तो सरकार को चुनौती देते हुए यही कहते हैं कि अगर उसके पास सुबूत हैं, तो फिर वह कार्रवाई क्यों नहीं करती? जब कभी कार्रवाई आगे बढ़ती है, तो यह शोर मचाया जाने लगता है कि सरकारी एजेंसियों का मनमाना इस्तेमाल किया जा रहा है। कई बार तो यह भी कह दिया जाता है कि जांच एजेंसियों के साथ-साथ न्याय-तंत्र भी सरकार से प्रभावित होकर काम कर रहा है। ऐसा तब तक होता रहेगा, जब तक जांच एजेंसियों का कामकाज विश्वसनीयता नहीं हासिल कर लेता। निस्संदेह, जांच एजेंसियों के साथ न्यायपालिका भी सक्रियता का परिचय दे। (हेमंत कुमार, गोराडीह, भागलपुर)

फिर गटर में मौतें
पता नहीं, इस देश में गटर में काम करने वाले अभागे सफाईकर्मियों का मौत का सिलसिला कब रुकेगा? हर घटना के बाद जांच होती है, एफआईआर होती है, मृतकों के परिजनों को मुवावजा देने की बात होती है, लेकिन होता कुछ नहीं है। कल ही उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में मलमार्ग वाले गटर के भीतर पांच सफाईकर्मी उतरे, उसके बाद उनका शव ही बाहर आया। जब से सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया है, तब से सरकारें 10 लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा करने को बाध्य हो रही हैं। अब भी कुल मृतकों में से केवल 25 फीसदी को ही यह रकम मिल पाती है। जिस तरह से सिर पर मैला ढोने की प्रथा का आहिस्ता-आहिस्ता अंत हो रहा है। उसी तरह, गटर के भीतर जाकर सफाई की मजबूरी को भी समाप्त कर दिया जाना चाहिए। (जंग बहादुर सिंह , जमशेदपुर)  

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