Hindustan Mail Box Column on 22nd August - आर्थिक असमानता DA Image

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आर्थिक असमानता

भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार लगातार बढ़ रहा है, जो कि एक सकारात्मक पक्ष है। लेकिन वर्तमान चुनौतियों को ध्यान में रखकर आर्थिक नीतियों का निर्माण किया जाना चाहिए, ताकि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित हो सके। आंकड़े बताते हैं कि भारत में बेरोजगारी दर 2017-18 में 6.1 प्रतिशत रही, जो दशकों बाद इतनी कम हुई है। एक ओर सरकार चतुर्थ औद्योगिक क्रांति में ब्लॉकचेन तकनीक, डिजिटल व ‘कैशलेस’ इकोनॉमी, रोबोटिक्स, क्वांटम कंप्यूटिंग, फॉग कंप्यूटिंग, क्लाउड कंप्यूटिंग, क्रिप्टोकरेंसी, बिग डाटा एनालिटिक्स, इंटरनेट ऑफ थिंग्स के उपयोग को बढ़ावा दे रही है, तो दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था में आर्थिक असमानताएं भी तेजी से बढ़ती जा रही हैं। आर्थिक असमानता सामाजिक, राजनीतिक व व्यक्तिगत असमानताओं की जननी होती है। चूंकि भारत में जनसंख्या वृद्धि दर अधिक और साक्षरता दर अपेक्षाकृत कम होने के कारण बेरोजगारी और अकुशलता अधिक है, इसके कारण संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। साफ है, जनसंख्या में साक्षरता, स्व-रोजगारोन्मुखी प्रवृत्ति का विकास करना होगा, जिससे अर्थव्यवस्था में रोजगार बढ़ सके। कृषि क्षेत्र पर अधिकाधिक निर्भरता को भी सेवा क्षेत्र में स्थानांतरित करना होगा, तभी निरंतर बढ़ती आर्थिक असमानता में कमी आ सकेगी।

ओम प्रकाश डूडी, जोधपुर

बाढ़ की मार 

अगस्त आते-आते सावन के उस महीने की शुरुआत होती है, जो कई धार्मिक त्योहारों से जुड़ा हुआ है। मगर दूसरी तरफ इस महीने में बारिश भी काफी ज्यादा होती है, जिसके चलते देश में कई राज्य प्रभावित होते हैं। हर साल यह बाढ़ तबाही लेकर आती है और भारी विनाश को जन्म देकर चली जाती है। प्रशासन में इस समस्या के निदान को लेकर कई बार अर्जियां दी जा चुकी हैं, पर ये नाममात्र की अर्जियां ही रह गई हैं।  विशेषज्ञ बताते हैं कि बाढ़ का सबसे बड़ा कारण औद्योगिकीकरण है। आज विकास के नाम पर वनों को अधिकाधिक काटा जा रहा है। इससे अत्यधिक बारिश होने पर भूस्खलन के चलते बाढ़ अधिक विनाशकारी हो जाती है। आज जरूरत इस बात की है कि इस समस्या के निदान को लेकर जागरूकता फैलाई जाए। संभव हो, तो स्कूली पाठ्यक्रमों में कुछ सामग्री जोड़ी जाए।

अमित कुमार, दिल्ली

ताकि बेहतर शिक्षा मिले 

हमारे देश में माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में दो मुख्य कठिनाइयां हैं। एक, कक्षा में विद्यार्थियों की अधिक संख्या, जिसकी वजह से शिक्षक प्रत्येक विद्यार्थी से संपर्क कायम नहीं कर पाता है, और दूसरी, ऐसे माहौल का अभाव, जिसमें विद्यार्थी स्वयं शिक्षक से सवाल पूछ सके। हमें इन समस्याओं को दूर करना होगा। यह समझना होगा कि कक्षा जितनी जीवंत रहेगी, पठन-पाठन उतना ही बेहतर होगा।

नवीनचंद्र तिवारी, रोहिणी, दिल्ली


सुधरते हालात

यह सही है कि कश्मीर में सुरक्षा और सतर्कता बढ़ानी पड़ी है, लेकिन इसे लेकर चिंतित हो रहे लोग यह क्यों नहीं देख पा रहे हैं कि वहां हालात तेजी से सामान्य हो रहे हैं। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि बीते एक पखवाडे़ में घाटी में जान-माल का नुकसान नहीं हुआ है। निस्संदेह, तथाकथित आजादी के सपने से प्रभावित कुछ कश्मीरियों को राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल होने में समय लगेगा, पर इसका यह मतलब नहीं कि इन लोगों को यह दिवास्वप्न दिखाया जाए कि बीते दिन फिर लौट सकते हैं। यह नहीं हो सकता, क्योंकि इस मामले में देश न केवल एकजुट, बल्कि दृढ़-संकल्पित भी है। इसी संकल्प भाव के कारण ही कश्मीर में अलगाववाद के समर्थकों के हौसले पस्त हैं और पाकिस्तान को भी समझ नहीं आ रहा है कि वह क्या करे।
हेमंत कुमार, भागलपुर
 

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