DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

कांग्रेस की हालत

राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिए कई दिन हो गए हैं, लेकिन पार्टी अभी तक अपना नया मुखिया नहीं चुन पाई है। यह अपने आप में आश्चर्य की बात है। भोपाल में खुद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस बाबत हैरानी जताई। लगता है, आज कांग्रेस लावारिस हालत में है। क्या देश की सबसे पुरानी पार्टी के पास ऐसा कोई नेता नहीं है, जो मुश्किल वक्त में पार्टी की कमान संभाल सके और सबको एक साथ रख सके। देश भर में कांग्रेस विधायक इस्तीफा दे रहे हैं। क्या यह माना जाए कि डूबते जहाज की वे सवारी नहीं करना चाहते? इसके ठीक विपरीत, भाजपा अपने अध्यक्ष का फैसला समय से पहले कर लेती है। इससे स्वाभाविक तौर पर वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनी हुई है। (शिरीष सकलेचा, मध्य प्रदेश)

अलग-अलग पैमाना
विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों की हो रही बहाली में एक अजीबोगरीब प्रक्रिया अपनाई जा रही है। इसमें नेट या नियमानुसार रेगुलर पीएचडी में से किसी एक को न्यूनतम पात्रता की मान्यता दी गई है, लेकिन नेट उत्तीर्ण करने वालों को केवल पांच अंक का भारांक (वेटेज) दिया जा रहा है, जबकि पीएचडी डिग्रीधारकों को 25-30 (महाविद्यालयों में 25 और विश्वविद्यालयों में 30) अंकों का। जब दोनों डिग्री समान रूप से न्यूनतम मानी गई है, तो भारांक में यह अंतर क्यों किया गया है? इससे हर साल अपनी प्रतिभा और परिश्रम के बल पर अखिल भारतीय स्तर पर ‘राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट)’ पास करने वालों का महत्व क्या रह जाएगा? कहीं यह नेट उत्तीर्ण कर पाने में असमर्थ पीएचडी धारकों को पिछले दरवाजे से लाने की कवायद तो नहीं? या तो नेट उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को भी बराबर का वेटेज मिलना चाहिए या इन दोनों में से किसी एक की न्यूनतम पात्रता की अनिवार्यता समाप्त कर दी जानी चाहिए। हालांकि एसोशिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के पद पर पदोन्नति सहित परा-स्नातक स्तर पर शिक्षण-कार्य के लिए नेट के साथ-साथ पीएचडी भी अनिवार्य होना चाहिए। (के. आर. संत, बेगूसराय)

रफ्तार पर लगे अंकुश
सड़कों पर गाड़ियों की जान लीलती रफ्तार पर आखिर सख्ती से अंकुश कब लगाया जाएगा? सर्वेक्षण रिपोर्ट बताती है कि देश के भीतर आतंकवाद से ज्यादा संख्या में सड़क हादसों में लोग मारे जा रहे हैं। चालकों की एक भूल कई परिवारों पर भारी पड़ती है। इन हादसों में कोई अकाल काल को प्राप्त होता है, तो कोई अपंग होकर अभिशप्त जिंदगी जीने को मजबूर। हाई-वे तो साक्षात् यमराज बनकर सामने आए हैं। आखिर कब तक तेज और लापरवाह रफ्तार निर्दोष लोगों की जान लेती रहेगी, और कब संबंधित कानूनों को अधिक कठोर बनाया जाएगा?  (सुरजीत झा, गोड्डा)

यह कैसा श्रम सुधार
केंद्र सरकार ने अभी व्यापक रूप से श्रम सुधार किए जाने का दावा किया है। इसमें न्यूनतम वेतन में सुधार को ‘ऐतिहासिक’ व ‘क्रांतिकारी’ बताया गया है। इसके तहत मजदूरों का एक दिन का वेतन 178 रुपये निर्धारित किया गया है। अब यक्ष प्रश्न यह है कि आज जब गैस का एक सिलिंडर लगभग 1,000 रुपये, आटा 32 रुपये और अच्छा चावल 40 रुपये प्रति किलो मिलता है, साथ-साथ कपड़े, शिक्षा और दवा आदि पर भी लोगों का ठीक-ठाक खर्च होता है। तब प्रतिदिन 178 रुपये यानी 5,340 रुपये महीने की आमदनी से कोई मजदूर स्वयं, अपनी बीवी और दो बच्चों की परिवरिश भला कैसे कर सकता है? क्या न्यूनतम मजदूरी तय करने वाले महंगाई और बाजार भाव से अनजान रहते हैं? ऐसी नीतियां तय करने वाले लोग चूंकि खुद विलासितापूर्ण जीवन जीते हैं, इसलिए वे जमीनी हकीकत से वाकिफ नहीं होते। गरीबों के साथ इस तरह का मजाक न ही हो, तो ठीक है। (निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Hindustan Mail Box Column on 13th July