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परेशान है पाकिस्तान

जन्नत कहे जाने वाले जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने पर हमारा पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान बेचैन और परेशान हो गया है। हो भी क्यों नहीं, इस अनुच्छेद का लाभ उठाकर ही वह घाटी में आतंकवाद फैला रहा था। अब उसने अपनी खीझ निकालते हुए भारत से अपने व्यापारिक रिश्ते खत्म कर दिए हैं। उसकी जनता तो पहले ही महंगाई से जूझ रही थी, अब इमरान सरकार के नए फैसले से लोगों के सामने विकट स्थिति आ गई है। मगर पाकिस्तान का सत्ता-प्रतिष्ठान इन सबसे बेपरवाह है। उसे तो बस आग में घी डालना है, चाहे क्यों न वह भी इस आग की चपेट में आ जाए। उसने भारतीय उच्चायुक्त को अपने देश लौटने को कहा और धमकी दी है कि वह कश्मीर मुद्दे को वैश्विक स्तर पर उठाएगा। मगर उसे शिमला समझौता नहीं भूलना चाहिए। उसके लिए बेहतर यही होगा कि कश्मीर को अस्थिर करने की वह न सोचे, बल्कि अपनी जनता की बेहतरी की दिशा में प्रयास करे। (दीपक कुमार, मनिका, लातेहार)

विपक्ष का शून्य होना
कांग्रेस अध्यक्ष पद से राहुल गांधी के इस्तीफे और सोनिया गांधी के फिर से अंतरिम अध्यक्ष बनने के बाद भी सवाल ज्यों का त्यों रह गया। क्या सच में नेहरू-गांधी परिवार ही कांग्रेस है और कांग्रेस ही नेहरू-गांधी परिवार? क्या इस परिवार से मुक्त होने का विकल्प कांग्रेस के पास नहीं है? क्या अब विपक्ष की शून्यता को मजबूत और जुझारू नेता से भरने में असमर्थ हो गई है भारतीय राजनीति? नरेंद्र मोदी जैसे चेहरे के सामने यदि विपक्ष नहीं टिक पा रहा, तो इससे भारतीय राजनीति की हानि होगी। मजबूत विपक्ष के बिना सरकार निरंकुश हो जाती है और निरंकुशता लोकतंत्र के लिए घातक है। (अनु मिश्रा, बसंतपुर, सिवान)

क्रिकेट की हैसियत
हमारे देश में अंग्रेजी के सामने जिस तरह हिंदी भाषा या हिंदी भाषा-भाषी को हिकारत की नजरों से देखा जाता है, ठीक वैसे ही क्रिकेट की तुलना में अन्य खेलों को कमतर आंका जाता है। इसके अतिरिक्त एक आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि चूंकि अंग्रेज यहां बरसों तक शासन कर गए हैं, इसलिए हमारे यहां जिस तरह अंग्रेजी भाषा के प्रति श्रेष्ठता की एक मिथ्या ग्रंथि कथित संभ्रांत लोगों के दिलो-दिमाग में बस गई है, ठीक उसी प्रकार, क्रिकेट नामक खेल भी ब्रिटिश उपनिवेशवाद वाले देशों में लोगों के दिलो-दिमाग पर छा गया है। इन देशों में यह औपनिवेशिक परंपरा अब भी चली आ रही है। उल्लेखनीय है कि अमेरिका, रूस, चीन जैसे ‘स्वाभिमानी’ देश ‘क्रिकेट’ को महत्व ही नहीं देते, वे व्यक्तिगत खेलों और शारीरिक सौष्ठव बढ़ाने वाले खेलों को प्रोत्साहित करते हैं। अब हमें, हमारे समाज और हमारी सरकारों को भी क्रिकेट की इस मानसिकता से बाहर निकलना चाहिए और अन्य व्यक्तिगत स्पद्र्धात्मक खेलों और खिलाड़ियों को बेहतर सुविधा देकर वैश्विक स्तर पर भारत का नाम बढ़ाना चाहिए। (निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद)

सोनिया को फिर कमान
जिस तरह भारत की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने एक बार फिर पार्टी की कमान सोनिया गांधी के हाथों में दे दी, उससे यह पुख्ता हो गया कि पार्टी में नेहरू-गांधी परिवार के अतिरिक्त कोई भी ऐसा नेता नहीं है, जो पार्टी में नई ऊर्जा का संचार करके उसको नई दिशा दिखा पाए। क्या विडंबना है कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी को राहुल गांधी का इस्तीफा स्वीकार करने में लगभग दो महीने लग गए। हालांकि, जिस तरह अनुच्छेद 370 हटने के फैसले का कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं ने स्वागत किया, उससे भी पता चलता है कि सोनिया गांधी की राह आसान नहीं होगी। आने वाले विधानसभा चुनाव उनके लिए अग्नि-परीक्षा होंगे। देखना होगा कि कांग्रेस किस दिशा में आगे बढ़ती है? (बाल गोविंद, सेक्टर- 44, नोएडा)

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  • Web Title:Hindustan Mail Box Column on 13th August