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जातिगत भेद

जातिगत भेद
भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। इसमें सभी देशवासियों को समानता का अधिकार दिया गया है। मगर देश की राजनीतिक पार्टियों ने सत्ता पाने के लिए इस अधिकार का काफी दुरुपयोग किया है। देशवासियों को जातियों में बांटकर, वोट पाने के लालच में उन्हें सुविधा देना शुरू कर दिया। इससे जातिवाद बढ़ता ही जा रहा है। आरक्षण को हर दल ने वोट पाने का हथियार बना लिया है। यदि आरक्षण देना ही है, तो उसे आर्थिक आधार पर देना चाहिए। गरीब हर जाति में हैं। यदि देश के कर्णधार इस ओर ध्यान नहीं देंगे, तो महाराष्ट्र जैसी घटनाएं होती रहेंगी। सबका साथ, सबका विकास तभी संभव है, जब संविधान के अनुसार सभी को समानता का अधिकार दिया जाए। -राकेश कौशिक, नानौता, सहारनपुर

किसानों के हित में
केंद्र सरकार ने जूट की खेती करने वाले किसानों और जूट उद्योगों को बढ़ाने के लिए चीनी व अन्य खाद्यान्न उत्पादों को जूट की पैकिंग जरूरी कर दी है। इससे जूट की खेती करने वाले किसानों की आय में वृद्धि होगी और स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होंगे। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, बिहार जैसे राज्यों में स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा। किसानों के हित में लिए गए इस फैसले से किसानों के जीवन में सुधार आएगा। कृषि के अन्य उत्पादों के संरक्षण और प्रोत्साहन के लिए भी केंद्र सरकार को कल्याणकारी योजनाएं बनानी चाहिए। -कुलदीप मोहन त्रिवेदी, उन्नाव

विलुप्त होती कला
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में लकड़ी के पुराने शानदार भवनों में छेनी से बनाई गई कलाकृतियां पहले ज्यादा देखने को मिलती थीं। ये भवन अपने-आप में बेहद खास और लोकप्रिय हुआ करते थे। सैलानी खास तौर पर इन्हें देखने आते थे। इन कलाकृतियों में बत्तख, हाथी, घोड़े, मछलियां, जंगली जानवरों का शिकार करने की मुद्रा, देवी-देवताओं की लीलाएं आदि होती थीं। जाहिर है, इसे बनाने वाले कलाकार भी अपने-आप में खास होते थे। मगर बदलते वक्त साथ, ये सब चीजें खत्म होने लगी हैं। ये कलाकृतियां, जो कभी पहाड़ी गांवों की शान हुआ करती थीं, अब विलुप्त होने लगी हैं। नतीजतन, शिल्पकारों की संख्या भी धीरे-धीरे कम होने लगी है। अब तो मानो कलाकृतियां और कलाकार, दोनों लुप्तप्राय से हो गए हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि अब ज्यादातर गांवों में लकड़ी और पत्थरों के मकानों का बनना बिल्कुल बंद हो गया है। अब यहां सीमेंट और ईटों से भवन बन रहे हैं। शहरीकरण के चलते पिछले कुछ वर्षों में पूरे पहाड़ का नक्शा ही बदल गया है। इस कला का विलुप्त होना पहाड़ के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए एक क्षति है। अगर अब भी इसे बचाने की ओर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तो एक पूरी सभ्यता और संस्कृति ही विलुप्त हो जाएगी। -राजेंद्र सिंह, श्रीनगर गढ़वाल

फिक्रमंद ट्रंप
पिछले 15 वर्षों में आतंकवाद से जंग के नाम पर अमेरिका 33 अरब डॉलर से ज्यादा की मदद पाकिस्तान को दे चुका है। यह बात खुद राष्ट्रपति ट्रंप ने बताई है और अब मदद देने से उन्होंने इनकार किया है। आर्थिक सहायता रुकने के बाद पाकिस्तान पर इसका क्या असर पड़ेगा और आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान कोई कदम उठाएगा या नहीं, इसे लेकर अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। फिलहाल यह कहा जा सकता है कि अपनी घटती लोकप्रियता से फिक्रमंद होकर ट्रंप ने ऐसा फैसला लिया है, ताकि अमेरिका में जनता का बड़ा वर्ग इससे खुश हो और दुनिया में उनकी वाहवाही हो। हालांकि चीन ने पाकिस्तान के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा है कि वह बेहतरीन काम कर रहा है और विश्व समुदाय को उसका समर्थन व सहयोग करना चाहिए। चीन और पाकिस्तान के बढ़ते रिश्ते पर नजर रखनी होगी। हमें भी अपनी तैयारियां चाक-चौबंद कर लेनी चाहिए। -कुशाग्र वालुस्कर, भोपाल

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  • Web Title:Hindustan Mail box column on 05 January