DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बेकाबू होता जिन्न

अभी एक दशक पहले तक सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी बहस के बावजूद लोक-मर्यादा का ख्याल रखा जाता था। कोई छुटभैया नेता किसी विरोधी के खिलाफ अभद्र टिप्पणी करता, तो उसे अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की लताड़ पड़ती थी, लेकिन अब तो पार्टियों ने बाकायदा एक ऐसी टीम गठित कर रखी है, जिनके सदस्य विपक्षी नेताओं का चरित्र हनन करते हैं। निस्संदेह, 2014 में चुनाव में सोशल मीडिया के जरिए यह काम भाजपा ने बड़े पैमाने पर शुरू किया और अब सभी पार्टियों ने उसका अनुकरण कर लिया है। दुखद यह है कि अब जिन्न बोतल से बाहर आ गया है और आम आदमी भी इस बहती गंगा में हाथ धोने लगा है। साइबर अपराधों के खिलाफ ठोस कानूनों की कमी ने इस दुष्कृत्य को और सहज बना दिया है। अब कोई नहीं बख्शा जाएगा। नई सरकार को इस दिशा में कुछ करना चाहिए। 
(शंकर सिंह चौहान, गुरु रामदास नगर, दिल्ली- 92)     

अनुचित हस्तक्षेप
सिविल सेवा देश की सर्वोच्च सेवा है। आईएएस-आईपीएस बनना ज्यादातर युवाओं का ख्वाब होता है, हालांकि कुछ ही लोगों के सपने पूरे हो पाते हैं। देश की कार्यपालिका इन्हीं लोगों के सहारे चलती है। मगर 2014 के बाद से इसमें काफी परिवर्तन देखने को मिल रहा है। मसलन, 2017 में कैडर आवंटन का नियम बदल दिया गया। आईएएस उत्तीर्ण लोगों के लिए पहले अपनी सेवा के लिए राज्य चुनने की स्वतंत्रता होती थी, अब क्षेत्र चुनने को कहा जाता है। ऐसे में, अखिल भारतीय स्तर पर आपकी कहीं भी पोस्टिंग की जा सकती है, जबकि एक आईएएस अधिकारी को जिस राज्य में सेवा देनी है, वहां की संस्कृति, भाषा, रहन-सहन का ज्ञान होना चाहिए। संवेदनशील प्रशासन के लिए यह जरूरी भी है। मगर नए नियम से इन प्राथमिकताओं का कोई महत्व नहीं रह गया। इसलिए 2018 बैच के कुछ अधिकारी इसके विरुद्ध उच्च न्यायालय गए, जहां से उन्हें राहत दी गई। मगर केंद्र सरकार अब सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ चली गई है। पता नहीं क्यों, यह सरकार इस सेवा को अपने हिसाब से चलाना चाहती है। पिछले दिनों सचिव व संयुक्त सचिव के पद पर निजी क्षेत्र के लोगों की नियुक्ति कर दी गई। क्या यह मेहनत करके आईएएस बनने वालों का अपमान नहीं है? (जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर)

हिंदी को महत्व दें
हिंदी आज अंग्रेजी व स्थानीय भाषाओं के बीच पिस रही है, इसके कारण आज तक हिंदी को वह स्थान नहीं मिल सका है, जो उसे मिलना चाहिए। आज ज्यादातर हिन्दुस्तानी अंग्रेजी भाषा का ज्ञान अर्जित करना अपनी शान समझते हैं और हिंदी को नजरंदाज करते हैं। माना कि प्रतिस्पद्र्धा भरे मौजूदा दौर में अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि हिंदी का प्रयोग करने में हम शर्म महसूस करें। अक्सर देखा जाता है कि कुछ राज्यों में सरकार की तरफ से जारी फॉर्म स्थानीय भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी में होते हैं, जिसके कारण इन भाषाओं का ज्ञान न रखने वाले दूसरे राज्य के लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। अगर देश के हर राज्य में हिंदी का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा किया जाता है, तो यह भारत की एकता की डोर को ओर मजबूत करेगा। (राजेश कुमार चौहान, जालंधर)

अमेरिका की दबंगई
ईरान से तेल आयात पर अमेरिकी पाबंदी के कारण समूचा विश्व भारी तेल संकट और आर्थिक संकट का शिकार बनने जा रहा है। बेहतर होता कि अमेरिका ईरान को मजबूर करने का कोई ऐसा विकल्प खोजता, जिसका दुष्प्रभाव अन्य देशों को न भुगतना पडे़। बहरहाल, दुनिया के देशों को अमेरिका के अनुचित आदेशों का एकजुट होकर विरोध करना चाहिए, ताकि उनकी अपनी तरक्की बाधित न हो और उनके देश की जनता को परेशान न होना। (सुभाष बुड़ावन वाला, खाचरौद)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Hindustan Mail Box Column May 15