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रोजगार की दरकार

नए आंकड़ों में बताया गया है कि बेरोजगारी दर लगभग सात फीसदी है। बेरोजगारी दर का ऊंचा दिखना निश्चित रूप से हमारे लिए चिंता का विषय है। किसी भी राष्ट्र के लिए अपने देश के नागरिकों को रोजगार देना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। जनता ने भले ही राष्ट्रवाद पर वोट देकर एक स्थिर और मजबूत सरकार चुन ली है, परंतु अभी भी रोजगार जैसी कई ज्वलंत समस्याएं हमारे सामने मुंह बाए खड़ी हैं। रोजगार पाने की उम्मीद में प्रत्येक वर्ष लाखों-करोड़ों नौजवान डिग्रियां लेकर निकलते हैं, जो कि अपने रुतबे और अपनी काबिलियत के अनुसार रोजगार पाना चाहते हैं। देश के युवा-वर्ग के सपनों को पूरा करने की जिम्मेदारी सरकार पर आकर ठहर जाती है। सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास का नारा तभी साकार होगा, जब देश में विकास और राष्ट्रवाद के साथ-साथ युवाओं को उनकी काबिलियत के अनुसार रोजगार के अवसर मुहैया कराए जाएंगे। सरकार को इस विषय पर अति शीघ्र विचार करना होगा। (हितेंद्र डेढ़ा, चिल्ला गांव)

प्रदूषण के जोखिम
आज दुनिया विकास की जो दौड़ लगा रही है, उसी में विनाश भी छिपा है। हमने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि हम न तो गरमी बर्दाश्त कर पा रहे हैं और न ठंड। इनसे राहत पाने के लिए हमने जो साधन जुटाए, वे और अधिक घातक सिद्ध हुए हैं। एसी के ज्यादा इस्तेमाल ने गरमी और सर्दी को नया आयाम दे दिया है। निश्चित तौर पर वायु प्रदूषण भीषण गरमी की वजह है। दुनिया में सड़कों पर एक अरब 35 करोड़ गाड़ियां धुआं छोड़ती हैं। खटारा वाहनों पर भी  शिकंजा नहीं कसा गया है। लकड़ी, पराली व प्लास्टिक जलाने से भी प्रदूषण बढ़ता है। साफ है, प्रदूषण आज दुनिया का सबसे बड़ा रिस्क फैक्टर है। फिर भी विलासिता की दौड़ थम नहीं रही है।
श्याम सिंह, माछरा, मेरठ

मानवता होती शर्मसार
शुक्रवार के अखबार में मानवता को शर्मसार करने वाली दो खबरें पढ़कर सोचने को मजबूर हुआ कि पूरी दुनिया को नैतिकता-इंसानियत की शिक्षा देने वाला और कन्या पूजा करने वाला हमारा यह देश खुद अनैतिक और गलत राह पर क्यों बढ़ चला है? क्यों लोगों के अंदर मानवता और नैतिकता का पतन हो रहा है? पंजाब में डेढ़ वर्षीया और देवभूमि हिमाचल प्रदेश में पांच वर्षीया बच्ची के साथ दुष्कर्म की खबर पढ़ने को मिली। ऐसे हैवान आखिर किस मिट्टी के बने हैं, जो अमानवीय कारनामों को अंजाम देने से भी नहीं कतराते। आखिर ऐसे हैवान फांसी के फंदे तक क्यों नहीं पहुंचते? क्यों कानून और सरकारें इन दरिंदों को सख्त सजा देने में देरी करती हैं? आखिर कब बेटियां सुरक्षित होंगी? ऐसे कई सवाल हैं, जो आज भी संवेदनशील लोगों के दिल-ओ-दिमाग दहका रहे हैं। अगर अब भी देश की बच्चियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई, तो आने वाला समय इससे भी विकट हो सकता है। (राजेश कुमार चौहान, जालंधर)

बेवजह का विवाद
विश्व कप का आठवां मुकाबला भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच खेला गया, जिसमें महेंद्र सिंह धौनी अपने कीपिंग ग्लब्स पर बने पैरा स्पेशल फोर्स के चिह्न के कारण सुर्खियों में आए और भारतीय फैंस की वाहवाही पाने में सफल रहे। मगर अब इन्हीं ग्लब्स के चलते आईसीसी ने बीसीसीआई से कहा है कि वह धौनी को यह चिह्न हटाने को कहे। धौनी ने इस चिह्न का इस्तेमाल अपने देश के बलिदानी ब्रिगेड को सम्मान देने के उद्देश्य से किया था, मगर आईसीसी नियमों का हवाला दे रही है। ऐसे में, सवाल यह है कि क्या आईसीसी किसी देश की स्पेशल फोर्स और राजनीतिक, धार्मिक और नस्लभेदी प्रतीकों के बीच अंतर नहीं कर पा रही? आईसीसी की यह अपील खारिज करने योग्य है।
(निशांत रावत, दिल्ली विश्वविद्यालय)

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  • Web Title:Hindustan Mail Box Column June 8