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मर्यादा में रहें विधायक

इंदौर में भाजपा विधायक आकाश विजयवर्गीय द्वारा नगर निगम कर्मचारी से मारपीट करना, कानून अपने हाथ में लेना बेहद शर्मनाक है। जन-प्रतिनिधियों की एक मर्यादा होती है। कानून-व्यवस्था का पालन करके वे जनता के समक्ष आदर्श प्रस्तुत करते हैं, लेकिन यदि वे खुद कानून तोड़ने लग जाएं, तो लोकतंत्र की रक्षा कैसे होगी? व्यवस्था का सम्मान करना और नियमों का पालन करना ही कर्तव्यनिष्ठ व समझदार व्यक्ति की पहचान है। जन-प्रतिनिधि को तो खास तौर से प्रतिकूल या विषम परिस्थितियों में अपना संयम, विवेक या आपा नहीं खोना चाहिए। इस घटना को किसी भी परिप्रेक्ष्य में सही नहीं ठहराया जा सकता। अन्य नेता इससे सबक लें और ध्यान रखें कि कानून से बढ़कर कोई नहीं है। यदि कानून नहीं रहा, तो अराजकता और अव्यवस्था पैदा हो जाएगी, जिससे शांति भंग होगी। 
मोहित सोनी, धार, मध्य प्रदेश

र्लिंंचग की वजह
तबरेज अंसारी की हत्या के मामले में जो लोग गिरफ्तार किए गए हैं, उनमें से ज्यादातर 30 साल से कम उम्र के कम पढ़े-लिखे लोग हैं और दिहाड़ी मजदूर, बेरोजगार या काम ढूंढ़ने वाले नौजवान हैं। मॉब लिंचिंग में शामिल अपराधियों में यह एक पैटर्न है। यह वर्ग समाज में फैलाई जा रही नफरत का आसानी से वाहक बन जाता है। उसके सामने राम की मूरत सीता, लक्ष्मण और हनुमान वाली सौम्यता नहीं, बल्कि सिक्स पैक एब वाली है। उसने राम के चरणों में बैठे हनुमान को नहीं, बल्कि गुस्से से भरे हनुमान को देखा है। चूंकि यह वर्ग ज्यादा शिक्षित नहीं है, तो उसे लगता है कि जो भ्रामक खबरें उस तक पहुंच रही हैं, वही सच है। फिर, व्यवस्था का गुस्सा भी तो उसे किसी पर उतारना है।
शमीम उद्दीन, वसुंधरा, गाजियाबाद

एक संसद, एक आवास
राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद हमारे माननीयों का जो संबोधन हुआ, उसमें उन्होंने देश की समस्याओं के समाधान पर केवल एक-दूसरे को कोसा और पूर्ववर्ती सरकारों को देश की बरबादी के लिए जिम्मेदार ठहराया। देश पर मंडराते जनसंख्या विस्फोट जैसे सबसे बड़े संकट पर किसी नेता ने मुंह नहीं खोला। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को पहले हरित प्रदेश बनाने की मांग हुआ करती थी, लेकिन विकास की कीमत अदा करते हुए यह इलाका अब तेजी से रेगिस्तान बनता जा रहा है। आयुष्मान भारत योजना को गुणवत्ता की किस कसौटी पर तौला जाए, जबकि सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा सुविधाओं की हालत खस्ता है। अस्पतालों में एक बिस्तर पर चार-चार मरीज लेटे दिखते हैं, लेकिन माननीयों के बंगलों में कई कमरे यूं ही खाली रहते हैं। क्या सारे माननीय एक बहुमंजिला भवन में एक साथ नहीं रह सकते, ताकि एक साथ ही इनकी सुरक्षा आदि का इंतजाम हो सके? एक देश, एक चुनाव अच्छी पहल है, तो एक संसद, एक आवास क्यों नहीं? इससे हर साल माननीयों के बंगलों और सुरक्षा पर खर्च होने वाले अरबों रुपये भी बचेंगे।
रचना रस्तोगी, मेरठ

कुछ तो गड़बड़ है
पिछले कुछ महीनों से जिस तरह धर्म के आधार पर लोग मारे जा रहे हैं या बीमारी से बच्चे समय-पूर्व मौत की गोद में जा रहे हैं, वह देश व सरकार, दोनों के लिए शर्मनाक बात है। आज जहां हम विश्व शक्ति बनने का सपना देख रहे हैं, तो दूसरी तरफ मॉब लिंचिंग हो रही है और चमकी बुखार से बच्चे दम तोड़ रहे हैं। यह तस्वीर हमें सोचने पर विवश कर देती है कि जब हम ऐसी चुनौतियों से लड़ने में भी असमर्थ हैं, तो बड़ी मुश्किलों का कैसे सामना करेंगे? केंद्र सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए और मुंगेरी लाल के हसीन सपने दिखाने की बजाय जमीनी हकीकत व जनता की परेशानी को समझना चाहिए और उनका निवारण करना चाहिए।
लकी मिश्रा
पीलीभीत, उत्तर प्रदेश

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