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बढ़ता टकराव

अमेरिका और ईरान के बीच यदि जंग होती है, तो कई देशों की आर्थिक मुश्किलें बढ़ सकती हैं। युद्ध की आशंका ईरान द्वारा अमेरिकी ड्रोन को मार गिराने के बाद बढ़ गई है। ईरान का दावा है कि ड्रोन उसकी सीमा में उड़ रहा था। हालांकि अमेरिका ने इससे इनकार किया है। वहीं, अमेरिकी अखबारों ने बताया है कि अमेरिका ने ईरान पर साइबर हमला किया है और उसके रॉकेट तथा मिसाइल लॉन्चर से जुड़े कंप्यूटरों को नुकसान पहुंचाया है। इसका खंडन ईरान ने किया है। अगर दोनों देशों में युद्ध होता है, तो विशेषकर तेल बाजार में अस्थिरता आएगी, जिससे कच्चे तेल के दाम काफी बढ़ सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में 70 फीसदी से अधिक तेल ईरान से ही आता है, इसीलिए कोई भी जंग तेल की कीमतों को प्रभावित करेगी। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए काफी नुकसानदेह होगा। (विविधा, डीयू)

चेत जाने का वक्त
तमाम मीडिया माध्यमों से इन दिनों जल संरक्षण की चर्चा सुनने को मिल रही है, लेकिन अब तक सरकार की ओर से ऐसा कोई ठोस उपाय नजर नहीं आता कि जल की बरबादी पर अति शीघ्र रोक लग सके। गांव हो या शहर, लोगों की मानसिकता जल संरक्षण के प्रति सही मायने में काम नहीं कर रही है। हर जगह पानी की बरबादी दिखती है। अगर जल दोहन इसी प्रकार से होता रहा, तो नहाने को तो छोड़िए, पीने तक के लिए पानी सुलभ नहीं होगा। यह सही मायने में चेत जाने का वक्त है। (जसबीर सिंह सिसोदिया)

बदहाल सिस्टम 
सवा अरब की आबादी वाले देश में क्या पहली बार किसी प्रदेश में सैकड़ों बच्चों की मौत हुई है? ऐसा क्या हुआ कि सारे मीडिया का ध्यान केवल एक प्रदेश तक सिमटकर रह गया, मानो शेष भारत में कोई बीमारी से मरता ही नहीं? क्या सरकारी अस्पतालों में वाकई वह इलाज मिल पाता है, जैसा रोगी को मिलना चाहिए? सरकार बताए कि पिछले पांच वर्षों में कितने डॉक्टरों की रिक्तियां निकाली गईं और कितने डॉक्टरों की स्थाई नियुक्तियां हुई हैं? साफ है कि ठेके पर डॉक्टरों की तैनाती करके इलाज में गुणवत्ता का दंभ भरने वाली सरकारें खुद ही जनमानस को बीमार बनाने पर तुली हैं। सिस्टम के भ्रष्टाचार ने अस्पतालों को बूचड़खाना बना दिया है, जहां उपकरण जंग खा रहे हैं, क्योंकि उनको चलाने वाले पेशेवर नहीं हैं, और जहां पेशेवर तैनात हैं, वहां उपकरण नहीं हैं, और जहां दोनों हैं, वहां उनके रख-रखाव का बजट नहीं है। नेताओं के दौरों में तो फिनाइल का पोंछा लगता है, बाकि बदबूदार व्यवस्था में ही डॉक्टर और मरीजों की जिंदगी गुजर जाती है। प्राइवेट इलाज भी किसी रंगदारी से कम नहीं, जहां फीस के नाम पर ही मरीज से काफी पैसा मांगा जाता है। (रचना रस्तोगी, मेरठ)

धर्म के नाम पर
देश में मॉब लिंचिंग की घटनाएं निरंतर बढ़ रही हैं। लोगों में कानून का भय इतना कम हो गया है कि वे बाकायदा ऐसी घटनाओं का वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित करने लगे हैं। इन घटनाओं में पीड़ित को धर्म विशेष के नारे लगाने पर विवश किया जाता है। सवाल यह है कि जबर्दस्ती धार्मिक नारे लगवाने से क्या पीड़ित का अपना धर्म बदल जाता है? निस्संदेह, धर्म आस्था से जुड़ा मामला है और यह किसी पर जबर्दस्ती थोपा नहीं जा सकता। मगर संकीर्ण मानसिकता के लोग इसी तरह का व्यवहार दिखा रहे हैं, जबकि उनका अपना धर्म इस तरह की घटनाओं को घृणित समझता है। इसके खिलाफ देश व प्रदेश की सरकारों को कठोर कदम उठाने चाहिए, ताकि लोगों में कानून का भय समाप्त न होने पाए। सभ्य समाज को भी ऐसे लोगों का बहिष्कार करना होगा, जो सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करने पर तुले हैं। (मंजर आलम, रामपुर डेहरु, मधेपुरा)

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  • Web Title:Hindustan Mail Box Column June 28