hindustan mail box column July 19 - बेपरदा हुआ पाकिस्तान DA Image

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बेपरदा हुआ पाकिस्तान

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा 15-1 के बहुमत से भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव की फांसी पर रोक का फैसला भारतीयों के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस फैसले पर अपनी खुशी जताते हुए इसे सच और न्याय की जीत बताया। परंतु हमें यह भी समझना होगा कि यह जीत अंतिम नहीं है। अब हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि अंतरराष्ट्रीय अदालत के निर्देशों के आलोक में कुलभूषण को उचित राजनयिक और कानूनी मदद मिले। और सबसे बड़ी बात यह कि उनका मामला वहां के सैन्य कोर्ट में नहीं, बल्कि सिविल कोर्ट में चले। बहरहाल, इस मामले को भारत सरकार जिस तत्परता से अंतरराष्ट्रीय अदालत में लेकर गई, और वकील हरीश साल्वे ने जिस कुशलता से इस पूरे प्रकरण में पाकिस्तान की कलई खोली, उस पर हम सबको गर्व है।
चंदन कुमार
देवघर, झारखंड

गिरफ्तारी का नाटक
मुंबई आतंकी हमले के मास्टर माइंड हाफिज सईद को पाकिस्तान में जेल भेजे जाने पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुशी जाहिर की है और इसे अमेरिका के दबाव का असर बताया है। भारत में भी लोग इस गिरफ्तारी पर खुश हैं। लेकिन अमेरिका हो या भारत, किसी को खुशफहमी में रहने की जरूरत नहीं। सईद को जेल भेजना पाकिस्तान का मात्र दिखावा है। पाकिस्तान सरकार के संरक्षण में हाफिज सईद बरसों से भड़काऊ  भाषण देता रहा है। वह तो पहले भी जेल जा चुका है और छूट चुका है। पूरी दुनिया यह भी जानती है कि किस तरह पाकिस्तान सरकार अपने आतंकियों की मदद करती है। इसलिए सईद की मौजूदा गिरफ्तारी को बस इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए कि इमरान खान अमेरिका जाने वाले हैं और वहां के आका को खुश करके अपने लिए कुछ इमदाद जुटाने की कोशिश में हैं। फिर, उस पर फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की काली सूची में होने का खतरा भी है। इसलिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यह सब नाटक रच रहे हैं। इसमें कहीं कोई गंभीरता नहीं है।
रामप्रकाश शर्मा, वसुंधरा

पुस्तकों से दूर
विगत कुछ वर्षों में जब से इंटरनेट ने रफ्तार पकड़ी है, तब से यही सूचनाओं के संग्रह, उनकी पड़ताल, संदेशों के आदान-प्रदान और मनोरंजन का प्रमुख साधन बन गया है। हालांकि इसने भले सूचनाओं तक लोगों की पहुंच को आसान बना दिया है, लेकिन नौजवानों को इसने किताबों से दूर भी किया है। आज नौजवान पुस्तकें पढ़ने की बजाय, इंटरनेट के माध्यम से सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर वक्त बिताना ज्यादा पसंद करते हैं। इस कारण प्रकाशकों ने भी पुस्तकों के पारंपरिक स्वरूप को बदलते हुए उसे डिजिटल बना दिया है। परंतु यह प्रयास भी नौजवानों को किताबों की ओर आकर्षित नहीं कर पाया। शायद इसकी वजह इसका बदला हुआ स्वरूप ही है। पारंपरिक पुस्तकें और उनके डिजिटल स्वरूप में महीन अंतर होता है। पारंपरिक पुस्तकों को खरीदने, उसे अपने हाथों में लेकर महसूस करने, उसके पन्नों को पलटने, अपने पसंदीदा प्रसंगों को चिह्नित करने जैसे जीवंत लम्हों को एक पुस्तकप्रेमी ही समझ सकता है। जबकि इस प्रकार का अनोखा अनुभव पुस्तकों के डिजिटल स्वरूप के साथ नदारद है। पारंपरिक पुस्तकों की ओर रुझान बढ़ाने के लिए जागरूकता फैलाने की जरूरत है।
तारकेश्वर, सीवान

सियासी दलदल
चौदह महीनों में फिर छाए घनघोर बादल/ राजनीति की बारिश ने कर्नाटक में की दलदल/ कौन बिका, किसने खरीदा, परदे के पीछे का खेल/ राजनीति ने लोकतंत्र को पीछे दिया घकेल/ पीछे दिया घकेल, ऊंट बैठे जिस भी करवट/ सत्ता ही दिखेगी विजय रथ दौड़ेगा सरपट।
बृजेश माथुर, बृज विहार, गाजियाबाद

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