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सार्थक पहल

सार्थक पहल
संसद से अनुपस्थित रहने वाले मंत्रियों की सूची मांगकर प्रधानमंत्री ने अत्यंत सार्थक काम किया है। अनुपस्थिति मानो हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन गई है, जो सरकारी कार्यालयों से लेकर संसद तक कायम है। संसद में उपस्थित रहने पर ही मंत्री बने रहने की अनिवार्यता की ओर प्रधानमंत्री का संकेत करना उचित है, पर यदि माननीयों की उपस्थिति उनकी नैतिकता से जुड़ जाए, तो कहीं ज्यादा सराहनीय काम होगा। इसी तरह, सरकारी कार्यालयों में भी उपस्थिति, समय पर उपस्थिति और पूर्णकालिक उपस्थिति के आधार पर पूर्ण वेतन का नियम लागू होना चाहिए। ऐसा होने पर कई समस्याओं का स्वत: समाधान हो जाएगा। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या इसे सही अर्थों में लागू किया जा सकेगा?
सम्राट सुधा, उत्तराखंड

पानी की ढुलाई
पहले मालगाड़ियों से सिर्फ कोयला, पेट्रोल, डीजल, खाद, चीनी आदि चीजों की ढुलाई की जाती थी। मगर अब ऐसा नहीं है। अब तो पानी भी मालगाड़ी से भेजा जाने लगा है। इस स्थिति के लिए आम जनता दोषी है। यदि हमने अब भी अपनी आदतों को नहीं सुधारा, तो इससे भी बुरे हालात का हमें सामना करना पड़ेगा। हमें प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग बंद करना होगा। पर्यावरण को सुरक्षित व संतुलित बनाए रखने के लिए कार्य करने होंगे। अधिक से अधिक पेड़ लगाने होंगे और उनकी रक्षा करनी होगी। पानी का अनुचित उपयोग रोकना होगा। यह समझना होगा कि प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं, इसीलिए इनका सदुपयोग होना चाहिए। इस बाबत सरकारों और संबंधित विभागों को जागरूकता अभियान चलाना चाहिए।
अनुज कुमार गौतम, दिल्ली

खेल अभी बाकी है 
कहते हैं कि जब तक सब कुछ बेहतर न हो जाए, कहानी का कुछ भाग शेष रहता है। यह बात माही पर भी सटीक बैठती है। कहने को तो महेंद्र सिंह धौनी महज एक नाम है, पर देखा जाए तो वह तमाम प्रशंसकों की जान हैं। विश्व कप के बाद अटकलें लगाई जा रही हैं कि वह अब शायद संन्यास ले लेंगे। पर आंखों में आंसू के साथ उस दिग्गज की विदाई नहीं हो सकती, जिसके लिए हजारों की आंखों में आंसू हैं। यह उन आलोचकों के लिए शर्म की बात है, जो उनसे संन्यास लेने की अपील करते हैं और उपलब्धि की जगह उम्र को तवज्जो देते हैं। वैसे भी, विश्व कप में उन्होंने अपनी भूमिका खूब निभाई है; सेमीफाइनल में भी। क्रिकेट प्रशंसक जानते हैं कि 2011 वल्र्ड कप में धौनी ने किस तरह भारत को बाहर होने से बचाया था। उन्होंने भारतीय क्रिकेट को एक नई ऊंचाई दी है। इसलिए उनकी विदाई के लिए भारतीय क्रिकेट को और सजग होने की आवश्यकता है, जो उनकी उपस्थिति में ही संभव है। धौनी का खेल अभी बाकी है।
आदित्य जयसवाल, धनबाद

विवादित बयान
एमडीएमके सांसद वाइको ने कहा है कि हिंदी में बहस/चर्चा होने से संसद का स्तर गिरा है। मगर ऐसा कहते हुए वह शायद यह भूल गए कि संसद लोकतंत्र की आत्मा होती है और यहां किसी भी भाषा में अपनी बात रखी जा सकती है। वाइको खुद तमिल में बयान दे सकते हैं, लेकिन उन्होंने जिस तरह अंग्रेजी से तुलना करके हिंदी को तुच्छ साबित करने की कोशिश की है, वह बिल्कुल गलत है। भारत में हिंदी बोलने वाली आबादी सर्वाधिक है और हिंदी की गिनती विश्व की बड़ी भाषाओं में होती है। संसद में ही अधिकतर सांसद हिंदीभाषी हैं और राष्ट्रीय संस्कृति से हिंदी जोड़ती है। जिन नेहरू की बात वाइको ने की, खुद उनके कई भाषण हिंदी में हैं। ऐसे में, सदन की कार्यवाही के गिरते स्तर के बहाने हिंदी पर निशाना साधना वाइको की संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है। वाइको को ऐसे बयानों से बचना चाहिए।
विजय किशोर तिवारी, नई दिल्ली
 

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