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सुधार की दरकार

आजादी के सात दशकों के बाद भी हमारा शिक्षा-तंत्र बीमार नजर आता है। बच्चे प्राइमरी शिक्षा की शुरुआत से ही बुनियादी सुविधाओं के अभाव में मानसिक दबाव की स्थिति से गुजरते हैं। ऐसे में, उनसे अच्छे परिणामों की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है? सरकार द्वारा शिक्षा क्षेत्र को ज्यादा तवज्जो न दिया जाना इस बदहाली का कारण तो है ही, बुनियादी सुविधाओं को चुस्त-दुरुस्त बनाए रखने में स्कूल प्रबंधन की भारी लापरवाही भी इसकी बड़ी वजह है। एक स्वस्थ शिक्षा तंत्र में पढ़े बच्चे ही भविष्य में देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर पाएंगे, इस सच को स्वीकार करते हुए ही सभी संबंधित पक्षों को शिक्षा-तंत्र की बेहतरी पर काम करना चाहिए।
रामप्रकाश शर्मा, वसुंधरा

 

बेबस सरकार
अल्पमत सरकार को समर्थन देकर सरकार बनाने में भूमिका निभाने वाले माननीय बदले में मंत्री पद या खास तवज्जो मिलने की अपेक्षा रखते हैं, और ऐसा न होने पर समय-समय पर सरकार गिराने की धमकी देकर मनमानी करने लगते हैं। यानी, लोकतंत्र की सरकार इन माननीयों के समर्थन पर आश्रित होने के कारण इनके हाथों की कठपुतली बनकर रह जाती है। विपक्ष भी इन्हीं माननीयों के ईमान और विचारधारा को तोड़ने की कोशिश में लगा रहता है, ताकि किसी तरह वह सत्ता पा सके। ऐसे में, जनता खुद को ठगा महसूस करती है। लोकतंत्र के लिए यह स्थिति भयावह है। कम से कम मंत्री पद के निर्धारण में तो इस बात का ख्याल रखा जाना चाहिए कि मंत्रीजी को अपने विभाग का उपयुक्त ज्ञान हो। दलगत-व्यक्तिगत हित की अपेक्षा इस प्रक्रिया को देशहित में बनाने की जरूरत है, अन्यथा सत्ता का घिनौना खेल यूं ही चलता रहेगा।
मोहित सोनी, धार, मध्य प्रदेश

 

सुधरती शिक्षा व्यवस्था
दिलीप रांजेकर का लेख ‘शिक्षा नीति का विमर्श और कुछ बुनियादी सुधार’ पढ़ा। शुरुआती वाक्यों में हरिशंकर परसाई और उनके व्यंग्यों की याद उभर आई। लेखक ने बड़ी बेबाकी से सरकारी स्कूलों की खस्ता हालत को सामने रखा। वह यह कहते हुए भी आगे बढ़ गए कि देश के ज्यादातर जिला शिक्षा प्रशिक्षण संस्थान की हालत खराब है। साफ है, लेखक ने स्कूली तंत्र का बेहद बारीक अध्ययन किया है, लेकिन उनसे मेरी असहमति दिल्ली के सरकारी स्कूलों को लेकर है। न तो दिल्ली के सरकारी स्कूल और न ही सरकारी शिक्षा प्रशिक्षण संस्थान अब वैसे रहे हैं, जैसा कि लेख में बताया गया है। एकाध अपवादों को छोड़कर तमाम सरकारी स्कूलों के बाथरूम घरों से भी बेहतर चमकते हैं। बच्चों के पढ़ने के लिए भी बेहद मजबूत और आकर्षक डेस्क-बेंच की व्यवस्था की गई है। बेशक दिल्ली के सरकारी स्कूल स्वर्ग सरीखे नहीं हो गए हैं, लेकिन इस गोलमाल सरकारी व्यवस्था को साधने के प्रयासों में  ईमानदारी और सच्चाई साफ-साफ देखी और महसूस की जा सकती है।
तरुण भसीन, दिल्ली

 

जल का संग्रह
पानी के घटते स्रोतों का संकट पूरी दुनिया के लिए चुनौतीपूर्ण है। अपना देश भी विकल्पों की तलाश में जुट गया है। बारिश के पानी का संग्रहण इन्हीं विकल्पों का हिस्सा है। इसे भूजल को पुनर्जीवित करने का एक अहम उपाय माना जा रहा है। इस लिहाज से बड़े-बड़े आवासीय फ्लैट्स, अपार्टमेंट्स व निजी भवनों में इसके लिए सरकार द्वारा कानूनन दबाव डालना अच्छी पहल है। मगर इससे भी आगे कुछ कदम उठाने की जरूरत है। बरसाती पानी का एक बड़ा हिस्सा सड़कों के रास्ते यूं ही बह जाता है। इसे चौक-चौराहों या छोटी पुलियों के नीचे व्यवस्था करके वापस जमीन के अंदर इकट्ठा करने के उपाय किए जाने चाहिए। जल बचाव की जिम्मेदारी की खानापूर्ति करने की बजाय सरकार को सामुदायिक ‘रिचार्ज पिट’ जैसे उपायों पर गंभीरता दिखानी चाहिए।
एमके मिश्रा, रातू, रांची

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