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5 मार्च, 2021|7:53|IST

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उम्र बाधा नहीं

तिरुवनंतपुरम के निकाय चुनाव में जीत के बाद देश के किसी भी शहर की सबसे युवा महापौर बनने जा रही 21 वर्षीया आर्या राजेंद्रन और ओडिशा के रहने वाले 64 वर्षीय सेवानिवृत्त बैंककर्मी जय किशोर प्रधान का मेडिकल की राष्ट्रीय पात्रता व प्रवेश परीक्षा में सफलता पाना एक असाधारण उपलब्धि है। जहां एक ओर आर्या बहुत कम उम्र में बड़ी जिम्मेदारी निभाने की क्षमता का उदाहरण पेश कर रही हैं, तो वहीं जय किशोर की सफलता धैर्य व निष्ठा से उम्र को मात देकर जीत हासिल करने की मिसाल है। इन दोनों के कार्य से न केवल समाज और देश, बल्कि विश्व के तमाम लोगों को यह संदेश मिलता है कि यदि व्यक्ति धैर्य और ईमानदारी के साथ लक्ष्य की ओर अग्रसर रहे, तो आयु कामयाबी में कतई बाधक नहीं बनती।
पुलकित आनंद, बिहार शरीफ

गतिरोध खत्म हो 
कृषि हमारे देश का आधार है, और धरतीपुत्र अन्नदाता किसान इसका बेटा, जो सभी का पेट भरता है। आज कड़ाके की ठंड में यह बेटा पिछले एक महीने से अपने हक के लिए ही नहीं, अपितु सभी के लिए सड़कों पर कुर्बानी दे रहा है। यह बड़े दुख और दुर्भाग्य की बात है कि अब तक मौजूदा किसान आंदोलन में कई किसान शहीद हो चुके हैं। ऐसा शायद देश के इतिहास में पहली बार हो रहा है। ऐसे में, किसानों और सरकार के बीच गतिरोध का बने रहना दुखद है। इससे हालात और बिगड़ रहे हैं। 2020 का यह वर्ष कोरोना महामारी और इसके चलते लगाए गए लंबे लॉकडाउन से घोर अंधकार, निराशा, कष्ट व कुर्बानियों के नाम रहा है। इन सबसे देश की आर्थिक सेहत पहले से ही बिगड़ी हुई है, ऊपर से किसानों का यह आंदोलन। जल्द ही कुछ करना होगा, नहीं तो नया वर्ष भी इस साल की तरह काला हो सकता है।
वेद मामूरपुर, नरेला

हड़ताल का असर
अभी तक देश में कोरोना की दवा और वैक्सीन उपलब्ध नहीं हो सकी हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली से हम सब गुजर ही चुके हैं। ऐसी परिस्थितियों में बिहार राज्य में जूनियर डॉक्टरों का हड़ताल पर जाना इंसानियत के खिलाफ है। डॉक्टरों को धरती का भगवान कहा जाता है, मगर अपनी मांगों को पूरा करवाने के लिए उन्हें लाखों लोगों का जीवन यूं संकट में नहीं डालना चाहिए। डॉक्टरों को अपना दायित्व पूरा करते हुए कोई आंदोलन करना चाहिए और समाज के सामने नजीर पेश करनी चाहिए। मरीज और डॉक्टर का अटूट रिश्ता होता है, जो भरोसे पर टिका होता है। यह भरोसा टूटना नहीं चाहिए। मानव जीवन को बचाने से बड़ा कोई दूसरा धर्म नहीं हो सकता, इसलिए इस तरह की हड़ताल को जल्द से जल्द खत्म करने के प्रयास होने चाहिए। ऐसी व्यवस्था भी होनी चाहिए कि भविष्य में ऐसी हड़ताल मानव जीवन को नुकसान न पहुंचा सके।
हिमांशु शेखर, गया

समर्थन दे उन्हें
किसान हाल ही में बने तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं, जो उन्हें अपने विवेक से अपनी उपज बेचने के अधिकार से वंचित करते हैं। किसानों को यह डर है कि ये नियम कॉरपोरेट जगत को कृषि उत्पाद खरीदने के क्षेत्र में प्रवेश दिलाने में मदद करेंगे और अंतत: किसानों को कॉरपोरेट द्वारा निर्धारित कीमतों पर अपनी फसलें बेचनी पड़ेंगी। केंद्र सरकार किसानों की समस्याओं के अध्ययन और उचित समाधान के बजाय अपने बल का उपयोग करके उनकी आवाज दबा रही है। किसान सर्वसम्मति से सरकार से मांग कर रहे हैं कि लागू किए गए किसान विरोधी कानूनों को रद्द किया जाए। साथ ही, उन्होंने स्पष्ट रूप से यह भी घोषणा की है कि जब तक सरकार उनकी मांगों को नहीं मानती, तब तक वे विरोध करते रहेंगे। इस कठिन समय में इंसाफ की मांग कर रहे किसानों को समर्थन देने की जरूरत है, दमन की नहीं। 
साजिद महमूद शेख, मीरा रोड, ठाणे

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  • Web Title:hindustan mail box column 29 december 2020