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आप की रायअर्श से फर्श पर

हिन्दुस्तानPublished By: Manish Mishra
Mon, 24 May 2021 10:55 PM
अर्श से फर्श पर

देश के युवाओं के आदर्श और कुश्ती के विश्व चैंपियन सुशील कुमार अपने साथी की हत्या के आरोप में अब सलाखों के पीछे हैं। बीजिंग और लंदन में तिरंगा लहराने वाला यह विश्व चैंपियन आज सभी से नजरें चुराने को मजबूर है। यह काफी शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण बात है। लोकप्रियता की चोटी पर पहुंचने वाले लोगों को यह पता होना चाहिए कि जो प्रसिद्धि मिली है, उसको कैसे संभाला जाता है। सुशील कुमार की इस हरकत का नकारात्मक असर अन्य खिलाड़ियों पर भी पड़ सकता है। हमें यह अच्छी तरह से समझना होगा कि अनुशासन और चरित्र के बिना जीवन की बड़ी से बड़ी सफलता भी बेकार हो जाती है। इसलिए बच्चों को अनुशासन और नैतिक ज्ञान की बातें बचपन से ही सिखलाई जाती हैं। अनुशासन के बिना विश्व चैंपियन भी अर्श से फर्श पर आ जाता है।
हिमांशु शेखर, गया

साहित्य में क्षेत्रीय शब्द
विगत कुछ दिनों से एनसीईआरटी की पहली कक्षा की एक कविता ‘आम की टोकरी’ के कुछ शब्दों पर आपत्ति जताई जा रही है। एनसीईआरटी ने भी अपने ट्विटर हैंडल से नई शिक्षा नीति का हवाला देकर बातें स्पष्ट करने की कोशिश की है। वास्तव में, इसे विवाद का विषय मानना ही निम्नस्तरीय सोच को प्रदर्शित करता है। इसमें दो शब्दों- छोकरी और चूसना, पर कुछ लोगों को आपत्ति है। छोकरी उत्तर और पूर्वोत्तर भारत का एक सामान्य शब्द है, जबकि चूसना शब्द का प्रयोग तो हम अपने दैनिक जीवन में भी करते हैं। कविता पर एक अन्य आरोप यह है कि यह बाल श्रम को प्रोत्साहित करती है, जबकि असलियत में यह परस्पर मेल-जोल बढ़ाने की बात करती है। साहित्य में क्षेत्रीय या स्थानीय शब्दों का प्रयोग नया नहीं है। आंचलिक उपन्यासकार तो बहुत से ऐसे शब्दों का भी चयन करते हैं, जो तथाकथित एलिट वर्ग को नागवार गुजरे। साफ है, यदि हम समावेशी शिक्षा अथवा समावेशी कक्षा को समृद्ध करना चाहते हैं, तो भाषा को सिर्फ मानक शब्दों के जाल से दूर रखना होगा। 
अमरेश कुमार, ईटानगर

एकजुट हों राजनेता
आज भारत अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ कोरोना महामारी खत्म होने का नाम नहीं ले रही, तो दूसरी तरफ ब्लैक फंगस नाम की बीमारी तेजी से अपने पांव पसार रही है। दिक्कत यह है कि राजनीति उसी घिनौने रूप में की जा रही है। दरअसल, इस मुश्किल घड़ी में आम नागरिक आस लगाए बैठे हैं कि जल्द ही इस समस्या का समाधान होगा, लेकिन सियासी दल वैक्सीन को लेकर भी राजनीति कर रहे हैं। क्या हमारे अंदर इतनी भी इंसानियत नहीं बची है? अभी जरूरी है कि राजनेता बिना किसी राजनीति के एक-दूसरे के साथ खड़े हों और आम लोगों की मदद करें। मुश्किल वक्त में ही नेतृत्व की परीक्षा होती है।
सृष्टि मौर्य, फरीदाबाद, हरियाणा

अब तो सुनो सरकार
कोरोना की दूसरी लहर की मार सबसे ज्यादा गांवों पर पड़ी है। चिकित्सा सेवा के अभाव में कितनों ने तड़प-तड़पकर दम तोड़ा है, इसका कोई आंकड़ा हमारे पास नहीं है। स्थिति यह है कि कई ऐसे गांव हैं, जहां अब तक कोई चिकित्सकीय टीम भी नहीं पहुंच सकी है। सरकारें इस बात से खुश हैं कि कोरोना के मामले अब घटने लगे हैं, लेकिन सुदूर गांवों की जो तस्वीरें आ रही हैं, उनसे भला कोई कैसे नजरें चुरा सकता है? वे कम होते इन आंकड़ों को गलत साबित कर रही हैं। स्थिति यह है कि गांवों में जांच नहीं हो रही, जांच यदि हुई भी, तो रिपोर्ट आने में देर लगती है। इन सबके कारण संक्रमितों को सही वक्त पर सही इलाज नहीं मिल पाता और स्थिति भयावह बन जाती है। पंचायत चुनाव के बाद से गांवों की स्थिति और खराब हो गई है।
अभिनव त्रिपाठी, बेल्थरा रोड, बलिया
 

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