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वाजिब चिंता

हिन्दुस्तान Published By: Naman Dixit
Mon, 21 Jun 2021 11:15 PM
वाजिब चिंता

पिछले दिनों राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपने संबोधन में न्यायपालिका द्वारा न्याय में हो रहे विलंब की ओर सबका ध्यान आकृष्ट किया, जो काफी संवेदनशील मसला है। यह बात बिल्कुल सत्य है कि हमारे देश में आम आदमी को त्वरित न्याय नहीं मिल पाता। कोई पीड़ित अदालत की शरण में जाता है, तो उसे इंसाफ पाने में वर्षों लग जाते हैं। इसके साथ-साथ उसे भारी आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। यही कारण है कि काफी सारे लोग जुल्म के खिलाफ आवाज नहीं उठाते। भारतीय न्याय-व्यवस्था की यह स्थिति अपने आप में काफी चिंतनीय है। इससे अपराध और अराजकता बढ़ने की बात विश्लेषक कहते रहे हैं। अदालत की साख और लोकतंत्र की सफलता को इससे चोट पहुंचती है। इसलिए राष्ट्रपति की बातों पर विचार करके उनके सुझावों को अमल में लाना चाहिए। किसी मुकदमे की सुनवाई और निर्णय की समय-सीमा निर्धारित होनी चाहिए, ताकि लोगों को जल्द न्याय मिले और अदालतों पर उनका भरोसा कायम रहे।
हरेराम सिंह, क्लब रोड, आरा

जल्द बने कानून
अखबारों में यह खबर पढ़कर मन गदगद हो गया कि उत्तर प्रदेश सरकार शीघ्र ही ऐसा कानून बनाने जा रही है, जिसके अंतर्गत दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को मिलने वाली सुविधाओं में कटौती की जाएगी। ऐसे कानून की जरूरत न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि पूरे देश में है। वास्तव में, जनसंख्या वृद्धि देश की ज्यादातर समस्याओं की जड़ है। बेरोजगारी, अपराध, सड़क दुर्घटना, अशिक्षा, भुखमरी जैसी तमाम समस्याओं के मूल में जनसंख्या वृद्धि ही है। सरकार से आग्रह है कि ऐसे कानून पर विचार-विमर्श में वक्त न गंवाते हुए शीघ्र कार्रवाई करे। यदि ऐसा हुआ, तो देश में अच्छे दिन आ जाएंगे। 
नरेंद्र टोंक, मेरठ

नई तकनीक पर पेच
हम उस दौर में जी रहे हैं, जहां तकनीक को बदलते वक्त नहीं लगता। कोविड-19 महामारी ने भी हमें डिजिटली सक्षम बनने की जरूरत बताई है। 5जी ऐसी ही एक नई तकनीक है, जिसके पक्ष-विपक्ष में लोग बंटे हुए हैं। इस अत्याधुनिक तकनीक में उपभोगकर्ताओं को ज्यादा नेट स्पीड, कम लेटेंसी और ज्यादा फ्लैक्सिबिलिटी मिलेगी। मगर जूही चावला जैसी हस्तियां इसके विरोध में हैं और इसके रेडिएशन से सेहत को होने वाले नुकसान की दुहाई दे रही हैं। इन लोगों का मानना है कि यह तकनीक धरती के तमाम जीवों को नुकसान पहुंचाती है। ऐसे में, सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि 5जी सेवा सेहत के लिए कितनी सुरक्षित है?
मोहिनी राणा
 भिवाड़ी, राजस्थान

अब स्कूल खोलें
कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए पिछले 15 महीनों से देश के ज्यादातर हिस्सों में स्कूल-कॉलेज बंद हैं। हालांकि, स्कूलों को बंद होने से इस वायरस की संक्रमण दर पर क्या असर हुआ है, इसका अब तक सही-सही आकलन नहीं हो सका है, लेकिन बच्चों की सुरक्षा, उनके बौद्धिक विकास और सीखने की प्रक्रिया पर स्कूल बंद होने के दुष्प्रभाव के बारे में कई लिखित और व्यावहारिक प्रमाण मौजूद हैं। बच्चों में गणितीय और लेखन क्षमता का ह्रास हुआ है। उनमें अवसाद, असुरक्षा की भावना और अकेलेपन की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। यह उनके और समाज के भविष्य के लिए कतई सही नहीं है। हाल ही में यूनिसेफ ने भी लंबे समय तक स्कूलों के बंद रहने से बच्चों पर पड़ने वाले इसके दुष्प्रभावों की चर्चा करते हुए इसे जल्द खोलने की पैरवी की थी। अत: शिक्षण संस्थान कुछ एहतियात के साथ जल्द खोले जाएं। वरना, बच्चों तक शिक्षा की पहुंच बढ़ाने में जो सफलता हमें दशकों में मिली है, वह लंबे समय तक स्कूलों के बंद रहने से बर्बाद हो सकती है।
आकांक्षा, अमरपुर

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