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सुरक्षा में चूक

हिन्दुस्तानPublished By: Naman Dixit
Mon, 11 Oct 2021 11:27 PM
सुरक्षा में चूक

लखनऊ से मुंबई जा रही पुष्पक एक्सप्रेस में लूटपाट और गैंगरेप की शर्मनाक घटना हुई है। चलती ट्रेन में लुटेरों ने न सिर्फ यात्रियों से पैसे, मोबाइल, कीमती सामान छीने और उनके साथ मारपीट की, बल्कि खबर है कि एक महिला को अपनी हवस का शिकार भी बनाया। साफ है, रेल यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी रेल विभाग की है। सरकार ने ट्रेनों के किराये में तो काफी वृद्धि कर दी, लेकिन सुरक्षित यात्रा का अपना वादा नहीं पूरा कर सकी। ऐसी घटनाओं से यात्रियों के मन में खौफ पैदा होना स्वाभाविक है। रेलवे को यात्रियों की यात्रा सुरक्षित बनाने के कडे़ इंतजाम करने चाहिए। यहां यह जरूर गौर किया जाना चाहिए कि आखिर सुरक्षा में चूक कहां हुई?
साजिद महमूद शेख, मुंबई

निजी हाथों में महाराजा
निजीकरण की राह पर चलती सरकार पिछले कुछ वर्षों से एअर इंडिया को बेचने का हरसंभव प्रयास कर रही थी। आखिरकार उसे इसमें सफलता मिल गई, जब इसके संस्थापक टाटा समूह ने उच्चतम बोली लगाकर इसका अधिग्रहण कर लिया। इस सौदे से सरकार को कोई बहुत बड़ी धनराशि नहीं मिल रही, लेकिन करीब 20 करोड़ रुपये प्रतिदिन का घाटा वह वहन कर रही थी। राष्ट्रीय विमानन कंपनी को घाटे में चलाना बहुत मुश्किल था। इस घाटे के कई कारण हो सकते हैं, फिर चाहे वह वजह अकुशल प्रबंधन हो, सरकारी नीतियों में कमियां हो या कर्मचारियों में असंतोष व नौकरी के प्रति असुरक्षा की भावना। बहरहाल, टाटा समूह पर न केवल देशवासियों का, बल्कि कार्यरत कर्मचारियों का भी भरोसा है। यही वजह है कि कर्मचारी संगठनों ने अपना शत-प्रतिशत योगदान देने की घोषणा कर दी है। उम्मीद यही है कि आने वाला वक्त एअर इंडिया के लिए अच्छा होगा और यह विमान सेवा विश्व पटल पर फिर से स्थापित हो जाए।
मुकेश पांडे, मेरठ

आतंकवाद पर प्रहार
भूगोल और जनसंख्या, दोनों के आधार पर हिन्दुस्तान एक विशाल देश है, जिसकी वजह से यहां की कई समस्याएं दूसरे देशों से भिन्न हैं। आतंकवाद की समस्या भी उनमें से एक है। हमारे यहां के कुछ लोग आतंकवाद को एक समुदाय विशेष से जोड़ देते हैं, जबकि इसका कोई धर्म नहीं होता। यह एक खतरनाक सोच है, जो हरेक समुदाय और धर्म के लिए समान रूप से हानिप्रद है। किसी समुदाय विशेष को इसके लिए जिम्मेदार बताना उसके खिलाफ नफरत की भावना को हवा देगा, जो भारत जैसे बहुलवादी देश में घातक हो सकता है। इसलिए आतंकवाद की चर्चा करते समय हमें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
आयुषी दुबे, कानपुर

टूटती उम्मीदें
लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा संचालित शासन प्रणाली है, इसलिए निर्वाचित प्रतिनिधि के अपने कर्तव्य-पालन में विफल रहने या किसी गलत कार्य में संलिप्त पाए जाने की स्थिति में ‘राइट टु रिकॉल’ का प्रावधान आवश्यक हो जाता है। ‘संपूर्ण क्रांति’ के सूत्रधार जयप्रकाश नारायण ने निर्वाचित सांसद-विधायक को वापस बुलाने के अधिकार का मुद्दा उठाया था, जो सत्ता-परिवर्तन के बावजूद लागू न हो पाया। उनकी क्रांति में जिन लोगों की राजनीति चमक गई, वे भी उनको भूल गए। 11 अक्तूबर को उनकी जयंती थी और 8 अक्तूबर को पुण्यतिथि, लेकिन कुछेक आयोजनों में इसकीऔपचारिकता पूरी कर ली गई। हाल के वर्षों में अन्ना हजारे ने भी अपने आंदोलन में ‘राइट टु रिकॉल’का मुद्दा उठाया था, लेकिन इस बार भी इतिहास ने खुद को दोहराया, और उनके आस-पास के तमाम लोग राजनेता बनकर कुरसी पर काबिज तो हो गए, लेकिन मुख्य मुद्दा लागू न हो सका। सच्चे बदलाव की बयार आखिर कब बहेगी देश में?
रूपेश कुमार पाठक, गया
 

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