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5 दिसंबर, 2020|4:53|IST

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राहत की उम्मीद

दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लगातार बढ़ते वायु प्रदूषण से चिंतित मौजूदा केंद्र सरकार एक नया अध्यादेश लेकर आई है, जिसके कठोर प्रावधानों से यहां के लोगों को बढ़ते वायु प्रदूषण से निजात मिलने की उम्मीद है। इस अध्यादेश के तहत वायु प्रदूषण फैलाने वालों को पांच साल तक की सजा हो सकती है, और उन पर एक करोड़ रुपये तक का आर्थिक जुर्माना भी लगाया जा सकता है। इन सबके लिए एक आयोग का गठन भी किया जाएगा, जिसके आदेशों को दिल्ली व एनसीआर से जुड़ी एजेंसियों को मानना जरूरी होगा। वायु प्रदूषण को रोकने के लिए केंद्र सरकार का यह एक अभूतपूर्व कदम है। अगर यह प्रयास जमीन पर कामयाब हो सका, तो निश्चय ही यहां के लोगों को काफी ज्यादा राहत मिलेगी। 
सुरेश बाबू मिश्र, बरेली

शिक्षित भारत का सपना
कोरोना महामारी की वजह से संपूर्ण मानव जीवन बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। इसकी वजह से लोगों के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक हितों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। शिक्षा जगत भी इससे अछूता नहीं है। बड़े महानगरों व शहरीकृत क्षेत्रों में तो जैसे-तैसे तकनीक व ऑनलाइन क्लास के माध्यम से बच्चों को शिक्षित करने की औपचारिकता पूरी की जा रही है, परंतु दूर-दराज के क्षेत्रों और ग्रामीण अंचल में आज भी लाखों बच्चे ऐसे हैं, जिन तक स्मार्टफोन तो दूर, अभी तक लर्निंग मैटेरियल तक नहीं पहुंचा है। रिपोर्ट बताती है कि देश में 5.3 फीसदी ग्रामीण बच्चों का अभी स्कूल में दाखिला तक नहीं हुआ है। आंकड़े वाकई चिंताजनक हैं। ऐसे में, केंद्र सरकार द्वारा विशेष नीति बनाए जाने के साथ-साथ सभी राज्य सरकारों को भी शिक्षा की मौजूदा स्थिति पर गंभीर होना चाहिए और उसमें सुधार के प्रयास करने चाहिए, तभी शिक्षित भारत का सपना पूरा हो सकेगा।
हितेंद्र डेढ़ा, चिल्ला गांव

बदलने लगे मुद्दे
पिछले वर्षों में मतदाताओं ने देश के नाम पर वोट देने के साथ केंद्र की सत्ता में परिवर्तन किया था। धीरे-धीरे उसका प्रतिफल भी दिखने लगा है। बिहार चुनाव को करीब से देखें, तो पता चलेगा कि अब चुनावी मुद्दे बदलने लगे हैं। शुरुआती दौर में कश्मीर में प्लॉट खरीदने जैसे बयान सुनाई दिए, जबकि बाद की रैलियों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, खेती-किसानी जैसी मूलभूत जरूरतों की तरफ ध्यान दिया जाने लगा है। उम्मीदवारों के समर्थन में तेजस्वी यादव लगातार मजदूर और किसान एकता के नारों को दोहरा रहे हैं। ऐसे में, उम्मीद यही है कि इस बार का बिहार चुनाव एक नई कहानी लिखेगा, जिसमें शिक्षा और रोजगार के साथ-साथ मजदूरों-गरीबों के हक पर नया जनादेश आएगा। एक नए बिहार को देखने का सपना करोड़ों बिहारियों के साथ-साथ अन्य राज्यों के नागरिकों का भी है, क्योंकि दूसरे राज्य भी जन-आकांक्षा को यह कहकर किनारे कर देते हैं कि राज्य की आबादी ज्यादा है। उम्मीद है, बिहार देश के लिए मिसाल बनेगा।
मनीष जैसल, मंदसौर

यह कैसा भेदभाव
केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा नौकरियों में आवेदन करने वाले आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों को आयु-सीमा और परीक्षा में बैठने के प्रयासों की संख्या में छूट का प्रावधान है। जैसे, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए अधिकतम उम्र-सीमा में तीन साल और अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति श्रेणी के अभ्यर्थियों को पांच साल तक की छूट दी जाती है। निर्धारित अंकों में भी आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों को छूट हासिल है। मगर आर्थिक पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों को ऐसी कोई सुविधा नहीं मिली हुई है, जिससे लाखों बेरोजगार अभ्यर्थियों में निराशा है। तमाम वंचित वर्गों को समाज की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए सरकारों को इस वर्ग को भी लाभ देना चाहिए।
अमित सुथार, दिल्ली

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  • Web Title:hindustan mail box column 02 november 2020