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1 जनवरी, 2021|11:15|IST

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संकल्प करें पूरा

नए साल का आगमन और पुराने की विदाई हो चुकी है। लोगों के दिल-ओ-दिमाग में नया साल नई ऊर्जा भर रहा है। इसी जोश में लोग नए-नए संकल्प भी ले लेते हैं। यह उम्मीद जताते हैं कि साल के अंत तक वे इस संकल्प को पूरा कर लेंगे। लेकिन कुछ समय के बाद ही न उनकी बातों में दम दिखता है, और न संकल्प पूरा करने के प्रयासों में ईमानदारी। नए साल की शुरुआत हो या जीवन में कुछ कर गुजरने का जुनून, हम सबको संकल्प लेना चाहिए, लेकिन यह दिखावे के लिए या देखादेखी करके न लिया जाए, बल्कि मन, क्रम और वचन से हमें संकल्प को पूरा करने में जुट जाना चाहिए। अक्सर लोग नए साल के आगमन पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, और कठिन से कठिन संकल्प कर बैठते हैं, लेकिन समय के साथ वह जोश ध्वस्त होता नजर आता है। संकल्प की सार्थकता तभी है, जब उसे पूर्ण किया जाए। झूठा संकल्प करने से बेहतर है, कोई संकल्प न लेना। और अगर हम संकल्प ले रहे हैं, तो उसे शिद्दत से पूरा करें, ताकि दूसरों के लिए हम प्रेरणा बन सकें।
माधुरी शुक्ला, सारनाथ

शोध-कार्यों में कमजोर
वही हुआ, जो होना था। कोविड-19 रोधी वैक्सीन अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों से ही सर्वप्रथम विकसित हुई, और लाख प्रगति और विकास के दावे के बावजूद हम वैक्सीन के खरीदार बनकर रह गए। साफ है, ‘वोकल फॉर लोकल’ की सोच एक बार फिर बेमानी होती दिख रही है। सवाल यह है कि शोध व अनुसंधान की दुनिया में हम इतने पीछे क्यों हैं? दरअसल, हम अब भी सामाजिक न्याय व समावेशी विकास के बजाय आरक्षण, धार्मिक उन्माद, भ्रष्टाचार, जात-पात, चीन-पाकिस्तान जैसे मुद्दों में उलझे हुए हैं। नतीजतन, हमारे शिक्षण संस्थान छात्रों को खोजी-मेहनती और शोध-उन्मुख नहीं बना पाते। हालांकि, एकाध संस्थान अपवाद जरूर हैं, फिर भी बहुतायत संस्थान शोध-कार्यों में काफी पीछे हैं। यह समझना होगा कि शोध-कार्य रूढ़िवादी सोच और व्यवहार में प्रगतिशीलता लाते हैं। इसलिए वे देश तरक्की करते हैं, जहां शोध-कार्यों की तरफ शिक्षण संस्थानों और सरकारों का जोर रहता है। हमें उनसे सबक लेना चाहिए। देश के नीति-निर्माता, शिक्षा जगत, और नवोन्मेष में रुचि रखने वाले लोग क्या इस दिशा में सोचेंगे?
अरविंद, गया

उम्मीदें बनी रहें
वर्ष 2021, नया साल, नई सुबह, नई उम्मीदें। क्या आम, क्या खास। हर कोई ले नया संकल्प नए विहान का। हम सभी यदि अपने अधिकारों के लिए ही नहीं, अपने कर्तव्य के प्रति भी जागरूक बन जाएं और उनका निर्वहन सही ढंग से करें, तो यकीनन देश-समाज की सूरत और सीरत, दोनों बदल जाएगी। 2020 की कोरोना महामारी ने बता दिया है कि निर्भरता और आत्म-निर्भरता के बीच संतुलन जरूरी है। चुनौतियों को अवसर में बदलने का हुनर हमने सीखा है, लेकिन कोविड-19 ने चौतरफा नुकसान किया है। उम्मीद है, इस साल हम सभी मिलकर देशहित में नया इतिहास रचेंगे।
हर्ष वद्र्धन, कदमकुआं, पटना

लोगों की सोचें
कोरोना महामारी ने पिछला पूरा वर्ष बरबाद कर दिया। देशवासियों, खासकर मजदूर वर्ग की आर्थिक स्थिति इस महामारी में बुरी तरह से बिगड़ गई है। ज्यादातर लोगों का जीवन-यापन मुश्किल हो चला है। ऐसी स्थिति में विपक्ष को गरीबों को राहत दिलाने के लिए आंदोलन करना चाहिए, ताकि निर्धनता के बोझ से दबे लोग सही से जीवन जी सकें। मगर ऐसा नहीं हो रहा। अभी जो आंदोलन चल रहे हैं, उसमें निजी स्वार्थ की बू आ रही है। अब जनता जागरूक हो चुकी है। उसको ओछी राजनीति पसंद नहीं। वह तो उसी पार्टी का समर्थन करेगी, जो उसके हितों के बारे में सोचती दिखेगी।
जसबीर सिंह सिसौदिया, हाथरस

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  • Web Title:hindustan mail box column 02 january 2021