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सजगता जरूरी

हिन्दुस्तानPublished By: Naman Dixit
Wed, 01 Sep 2021 03:26 AM
सजगता जरूरी

कोरोना से छात्र-छात्राओं का बहुत नुकसान हुआ है, और हो रहा है। विद्यालय के अंदर शिक्षण ग्रहण करना एक उत्तम व्यवस्था है, जिसके समान फायदेमंद ऑनलाइन व्यवस्था नहीं हो सकती। हालांकि, कुछ जगहों पर स्कूल खोले गए हैं, लेकिन अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए बाध्य नहीं हैं। फिलहाल कोरोना महामारी का असर कुछ कम दिख रहा है, लेकिन तीसरी लहर की आशंका बनी हुई है। अगर तीसरी लहर आती है, तो विद्यार्थियों को कतई विद्यालय नहीं बुलाया जाएगा। साथ ही, ऑनलाइन शिक्षण की व्यवस्था भी कायम रहेगी। फिर भी, अभिभावकों को बच्चों को विद्यालय भेजने से पूर्व यह पता होना चाहिए कि उनकी सहमति से ही स्कूल खोले जा रहे हैं, इसलिए बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी उनकी ही है। लिहाजा, अभिभावकों को बिल्कुल सजग रहना चाहिए और सोच-विचार करके कदम उठाना चाहिए।
ऋषि कुमार दीक्षित, एटा, उ.प्र.

ंहदी से कैसी शर्म
हिंदी को दोयम दरजे का समझना चिंता की बात है। यह समस्या उच्च वर्ग की ही नहीं, मध्यम वर्ग की भी है। ये लोग आज हिंदी पढ़ने-बोलने में शर्म महसूस करते हैं और टूटी-फूटी भाषा में ही सही, अंग्रेजी बोलना पसंद करते हैं। अंग्रेजी बोलकर वे खुद को कहीं ज्यादा शिक्षित और पढ़े-लिखे होने का एहसास दिलाना चाहते हैं। महात्मा गांधी ने कभी जरूर कहा था कि निज भाषा के अनादर को मां के अनादर के समान मानना चाहिए, लेकिन आज कुछ लोगों की दीन-हीन मानसिकता निज भाषा की उन्नति में बाधक है। इसलिए, जब तक हिंदी पूरी तरह से उच्च शिक्षा की भाषा नहीं बनेगी, इसकी तरक्की के बारे में सोचना दिवास्वप्न है।
रमेश शर्मा, दिल्ली

मारामारी की आग
आखिर मारामारी की यह आग कब बुझेगी? हम सब यही मानते थे कि ज्यों-ज्यों मानव तरक्की करेगा, हर तरफ शांति, अमन, चैन का राज स्थापित होगा। मानव मानव में प्रेम होगा, विश्व के हर देश एक-दूसरे से कंधा मिलाकर तरक्की की नई गाथा लिखेंगे, लेकिन ज्यों-ज्यों हमारी शिक्षा-दीक्षा या वैज्ञानिक कुशलता बढ़ रही है, त्यों-त्यों अमानवीयता में भी इजाफा हो रहा है। अफगानिस्तान इसका ज्वलंत उदाहरण है। यह विडंबना ही है कि विश्व में इतनी तरक्की होने के बाद भी मध्ययुगीन बर्बरता कट्टरता के साथ कायम है। फिर चाहे वह तालिबान हों या अन्य आतंकवादी! अगर हम इन सबको खत्म करना चाहते हैं, तो हमें जंगी माहौल बनाने से बचना होगा।
हेमा हरि उपाध्याय
 उज्जैन, मध्य प्रदेश

असहाय अफगानी
पड़ोसी देश अफगानिस्तान में अभी जैसे हालात हैं, उसमें लोग वहां एक पल भी रुकने को तैयार नहीं हैं। अफगान नागरिक भी अपने परिजनों के साथ उस नरक को जल्द छोड़ना चाहते हैं। तालिबान भले उदार बनने का दावा कर रहे हों, पर सच सामने है। ऐसे में, सवाल यही है कि बेबस अफगानियों को कौन पनाह देगा? विडंबना है कि कई मुस्लिम देश भी शरणार्थियों को पनाह देने से मना कर चुके हैं। कइयों ने चुप्पी साध ली है। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। दिक्कत यह भी है कि अगर मुस्लिम देश उनको पनाह नहीं दे रहे हैं, तो कोई सवाल नहीं उठता, लेकिन जब कोई विकसित या विकासशील देश उनको अपने पास रखने के लिए मना करते हैं, तो मानवाधिकार की दुहाई दी जाने लगती है। इस तरह की सोच गलत है। सभी देश अपना-अपना फायदा और नुकसान देखने के बाद ही अफगानी नागरिकों को शरण देंगे। हमें भी भावनात्मक रूप से नहीं, व्यावहारिक रूप से इस मसले का हल निकालना चाहिए। आखिरकार यह हमारे देशहित का मामला है!
शशांक शेखर
नोएडा, उत्तर प्रदेश

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