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27 जनवरी, 2020|9:01|IST

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वीडियो गेम से दूरी

‘ब्लू व्हेल गेम’ जैसे जानलेवा खेल का इन दिनों तूती बोलना खतरे की घंटी है। अपने देश में इससे मौत का मामला सामने आया है। हमें समझना होगा कि ऑनलाइन गेम में फंसना खुद का नुकसान करना है; फिर चाहे गेम कोई-सा भी हो। मगर आज मुश्किल यह है कि बच्चे तो बच्चे, बड़े भी वीडियो गेम्स के पीछे पागल रहते हैं, और इसी कारण ‘ब्लू व्हेल’ जैसे गेम की जद में आसानी से फंस जाते हैं। वाकई जब बड़े ही वीडियो गेम खेलते रहेंगे, तो वे भला अपने बच्चों को कैसे इससे दूर रख सकते हैं? गेम ने उन्हें अपने आसपास की दुनिया से दूर कर दिया है। इसके सहारे वे अपनी ही दुनिया में मग्न रहते हैं। यह आभासी दुनिया खत्म होनी चाहिए। वक्त की यह जरूरत है कि बच्चों को स्कूल से ही इस विषय के बारे में सचेत किया जाए।
जयेश राणे, मुंबई, महाराष्ट्र

भरोसा तोड़ते नेता
दल-बदल बुरा नहीं है, मगर अभी-अभी चुने गए और अभी-अभी अपना दल बदल लिया, यह कोई अच्छी बात नहीं। जनता जिस प्रतिनिधि को चुनकर विधानसभा या लोकसभा में भेजती है, यदि वह अपने स्वार्थ के चलते दल-बदल करता है, तो इसको स्वस्थ राजनीतिक परंपरा नहीं मानना चाहिए। अगर ऐसा होता है, तो जनप्रतिनिधि को फिर से जनता का भरोसा जीतने के लिए उसके पास जाना चाहिए और उसका विश्वास जीतकर आना चाहिए। क्या इतनी हिम्मत है किसी जनप्रतिनिधि में? अभी तक तो व्यक्तिगत तौर पर इक्का-दुक्का जनप्रतिनिधि ही दल-बदल करते रहे हैं, पर अब समूह के समूह ऐसा करने लगे हैं। इस परंपरा पर रोक लगनी चाहिए।
महेश नेनावा, इंदौर, मध्य प्रदेश


सौतेला व्यवहार
पदक जीतकर लौटे दिव्यांगों का स्वागत तक नहीं, समाचार पहले पृष्ठ पर पढ़ा। हैसियत देखकर खिलाड़ियों के स्वागत के लिए पहुंचने वाले लोगों की मानव-मानव विभेद की प्रवृत्ति इस खबर से उजागर होती है। ऐसा लगता है कि दिव्यांगों के प्रति कहना कुछ और करना कुछ जैसी सोच है। दिव्यांगों के प्रति नजरिये में बदलाव जरूरी है। यह समझना चाहिए कि पदक लेकर लौटे दिव्यांग खिलाडि़यों ने, फिर चाहे वे मूक-बधिर ही क्यों न हों, देश का नाम रोशन तो किया ही है। अब जबकि उनका स्वागत नहीं हो सका, तो कम से कम एक राष्ट्रीय स्तर का कार्यक्रम आयोजित करके तमाम दिव्यांग खिलाड़ियों का सम्मान जरूर किया जाना चाहिए।
भगवती प्रसाद गेहलोत, मंदसौर

मेले में अलग होना 
संपादकीय पेज पर महेन्द्र राजा जैन का लेख ‘ इस मेले मेें लोग आते हैं अलग होने के लिए’ पढ़ा। इसमें ऑस्ट्रिया के एक नए किस्म के मेले की जानकारी दी गई है, जो काफी रोचक भी है। मगर चूंकि पश्चिम में जो कुछ भी होता है, उसकी नकल करने में हम भारतीय अपनी शान समझते हैं, इसलिए आशंका यही है कि देर-सवेर तलाक लेने का यह प्रचलन भारत में भी बढ़ सकता है। इस संदर्भ में यह देखना चाहिए कि भारतीयों में तलाक लेने की प्रवृत्ति पश्चिमी देशों से कम है, क्योंकि हमारे यहां परिवार को एक संस्था भी माना जाता है। इसलिए बेहतर होगा कि यह संस्था न टूटे और हम इस मेले का अंधानुकरण न करें।
राजेश ‘ललित’ शर्मा, नई दिल्ली


खोखले दावे
उत्तराखंड सरकार जहां प्रदेश में विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है, तो वहीं आज भी आपदा की वजह से टूटे कई पुलों का निर्माण नहीं हो सका है। वे पुल बिल्कुल टूटी अवस्था में ही हैं। लोग लकड़ी के खुद के बनाए पुलों पर से जान हथेली पर रखकर नदी या धारा पार करते हैं। इस चक्कर में कई लोग अपनी जान भी गंवा चुके हैं, पर शासन-प्रशासन में सुस्ती कायम है। सरकार ऐसे मामलों में त्वरित निर्णय क्यों नहीं लेती है?
लछमण पुण्डीर, श्रीनगर, उत्तराखंड

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