बिहार में 4 MLA ने खाली की MLC सीट, फिर 3 किस्त में चुनाव क्यों? RJD को नुकसान!
Bihar MLC Elections: बिहार विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बने जदयू और भाजपा के 4 विधान पार्षदों की नवंबर में खाली सीटों पर किस्तों में चुनाव हो रहे हैं। अलग-अलग चुनाव से राजद को घाटा की बातों में कितना दम है, जानते हैं।
Bihar MLC Elections: बिहार विधानसभा के लिए नवंबर में हुए चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और जदयू के चार विधान पार्षद चुनाव जीतकर विधायक बन गए थे। सम्राट चौधरी, मंगल पांडेय, भगवान सिंह कुशवाहा और राधा चरण साह। इन सबने एक सदन का सदस्य रहते दूसरे सदन का सदस्य चुने जाने के नियमों के तहत रिजल्ट से 14 दिन के अंदर एमएलसी पद से इस्तीफा दे दिया था। अब चुनाव आयोग उन चार खाली सीटों के लिए चुनाव के कार्यक्रम किस्तों में घोषित कर रहा है। इन चार सीटों में तीन सीट विधानसभा सदस्यों के वोट से भरी जाती है, जबकि एक सीट स्थानीय निकाय कोटे की है, जिसमें जिला परिषद से पंचायत तक के निर्वाचित जनप्रतिनिधि वोट करते हैं। इससे राजद को घाटा की बातें हो रही हैं, लेकिन उस दावे में कितना दम है, ये समझते हैं।
पहले राधा चरण साह की भोजपुर-बक्सर की स्थानीय निकाय सीट के लिए 9 अप्रैल को चुनाव की घोषणा हुई और आज गुरुवार 16 अप्रैल को मंगल पांडेय की विधानसभा कोटे की सीट पर चुनाव का ऐलान हो गया। दोनों चुनाव 12 मई को होंगे, लेकिन मंगल पांडेय की सीट का नतीजा उसी दिन शाम में आ जाएगा, जबकि राधा चरण साह की सीट का रिजल्ट 14 मई को मतगणना से आएगा। एमएलसी की नवंबर में खाली हुई सम्राट चौधरी और भगवान सिंह कुशवाहा की 2 और सीटें बचीं हैं, जिनके लिए चुनाव आयोग तीसरी अधिसूचना अलग से जारी करेगा।
स्थानीय निकाय कोटे की सीट के वोटर पंचायती राज व्यवस्था के जनप्रतिनिधि होते हैं तो राधा चरण साह की सीट का कोई मसला ही नहीं है। बची 3 सीटें विधानसभा कोटे की हैं यानी जिनको विधायक चुनते हैं। इस कोटे की सीट में विधायकों के कुल मतदान के आधार पर जीत का कोटा तय होता है। विधान परिषद में विधायक कोटे की 3 खाली सीटों पर आयोग एक साथ चुनाव करवा देता तो जीत का कोटा 61 वोट के ऊपर जाता। एनडीए गठबंधन के पास 202 विधायक हैं। बचे हुए 41 के दम पर एक भी सीट नहीं निकल सकती है। इसलिए अगर कोई भ्रम है कि अलग-अलग चुनाव कराने से राजद को घाटा होगा तो यह समझ लेने की जरूरत है कि राजद को तब भी कोई मुनाफा नहीं होगा, जब खाली सीटों के चुनाव एक साथ हो जाएं।
फिर चुनाव आयोग चुनाव तीन किस्त में क्यों करवा रहा है। इसका जवाब चुनावी नियमों में ही लिखा है। राधा चरण साह की सीट पर स्थानीय निकाय के वोटर वोट करेंगे, इसलिए उसे अलग रखा गया है। इस सीट पर उप-चुनाव है, क्योंकि साह का कार्यकाल अप्रैल 2028 तक था। मंगल पांडे, सम्राट चौधरी और भगवान सिंह कुशवाहा ने इस्तीफा तो नवंबर में दिया है, लेकिन उनकी सीटों के बचे हुए कार्यकाल में बहुत महत्वपूर्ण अंतर है, जिसके कारण मंगल पांडेय की सीट पर तो उप-चुनाव हो रहा है, लेकिन सम्राट चौधरी और भगवान सिंह कुशवाहा की सीट पर द्विवार्षिक चुनाव होंगे। इन तीन के चुनाव दो किस्त में होंगे।
मंगल पांडे का एमएलसी कार्यकाल 2030 तक था, इसलिए इस सीट को भरने के लिए उप-चुनाव होगा। सम्राट चौधरी और भगवान सिंह कुशवाहा वाली सीट का टर्म 28 जून 2026 को पूरा हो रहा है। यह सीट 2020 में द्विवार्षिक चुनाव से भरी गई थी। इनके कार्यकाल बहुत कम बचे थे, इसलिए इसे विधान परिषद की जून में खाली हो रही 7 अन्य सीटों के साथ चुनाव के लिए बचा लिया गया है। जून 2026 में इन 2 सीटों के अलावा जदयू के गुलाम गौस, भीष्म सहनी और कुमुद वर्मा, भाजपा के संजय मयूख, राजद के सुनील सिंह, फारूख शेक और कांग्रेस के समीर कुमार सिंह की सीट खाली होनी थी।
चुनाव आयोग इन 9 सीटों पर द्विवार्षिक चुनाव कराएगा। संभावना है कि मई में इसकी प्रक्रिया शुरू हो जाए। एमएलसी चुनाव नियम से जब 9 सीट पर चुनाव होंगे तो एक सीट जीतने के लिए 25 वोट का कोटा होगा। 25 विधायकों की वाली राजद एक सीट निकाल सकती है। महागठबंधन के पास 35 वोट हैं। विपक्ष में कुल 41 विधायक ही हैं, इसलिए दूसरी सीट मुश्किल होगी, क्योंकि उसके लिए 50 से ऊपर विधायकों का समर्थन चाहिए। विपक्ष को दूसरी सीट तो मिलती नहीं दिख रही, लेकिन एमएलसी चुनाव में यह देखना भी दिलचस्प रहेगा कि राबड़ी देवी के मुंहबोले भाई सुनील सिंह पार्टी के लिए बन पा रही एक सीट से दोबारा उतारे जाते हैं या असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM राज्यसभा चुनाव में मदद का हिसाब मांग लेती है।


