
जो ओवैसी को कहते रहे बीजेपी की B टीम, उस MGB से महागठबंधन के लिए AIMIM क्यों बेचैन है?
बिहार के विपक्षी महागठबंधन (MGB) में सीट बंटवारे पर खींचतान के बीच ओवैसी की पार्टी AIMIM उसमें शामिल होकर लड़ने के लिए परेशान है। लालू-तेजस्वी भाव नहीं दे रहे हैं तो कांग्रेस या लेफ्ट भी कुछ कर नहीं पा रही है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में सीमांचल के तीन जिलों से 5 सीट जीतकर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और कांग्रेस के लिए खतरा बनकर उभरी असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी पांच साल के अंदर ही विपक्षी महागठबंधन (MGB) में शामिल होकर 2025 का चुनाव लड़ने के लिए मरी जा रही है। ये वो पार्टियां हैं जो ओवैसी और AIMIM को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की बी टीम बताती रही हैं। एक महीने से एआईएमआईएम के इकलौते बचे विधायक और प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान महागठबंधन को खुला ऑफर दे रहे हैं, लेकिन बात बन ही नहीं पा रही।
ईमान ने कई बार कहा कि एआईएमआईएम की तैयारी तो वैसे 50 सीटों पर है लेकिन सेकुलर वोटों का बिखराव रोकने के लिए वो महागठबंधन में एंट्री चाहती है। सीटें कम भी हो तो चलेगा अगर राजद, कांग्रेस, लेफ्ट और वीआईपी साथ ले लें। ईमान लगातार राजद के नेताओं से बात कर रहे हैं लेकिन लालू यादव और तेजस्वी यादव तैयार नहीं हैं। अब तो राजद सांसद मनोज झा ने साफ ही कह दिया कि अगर ओवैसी भाजपा को हराना चाहते हैं तो बिहार का चुनाव ना लड़ें, यही उनकी मदद होगी। 2020 के चुनाव में ओवैसी की पार्टी 5 सीट जीती थी और 4 सीट पर तीसरे नंबर और 6 सीट पर चौथे नंबर पर रही थी।
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सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में भाजपा के अलावा नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू), चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी- रामविलास (एलजेपी-आर), जीतनराम मांझी की हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) है। इस लिहाज से सुनने में तो ये बात ठीक लगती है कि ओवैसी की पार्टी विपक्षी गठबंधन के साथ आ जाए तो मुस्लिम वोटों के बंटवारे का खतरा कम होगा। एनडीए के दलों में नीतीश और चिराग की भी पकड़ मुस्लिम वोटों पर है। मांझी और कुशवाहा का भी दावा है।
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ऐसे में ओवैसी का महागठबंधन के पाले में आने की बेचैनी राजनीतिक पंडितों को परेशान कर रही है। इससे भी ज्यादा हैरानी तेजस्वी यादव का एआईएमआईएम के ऑफर को ठुकराना है जो शायद अपने राजनीतिक जीवन की सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ने जा रहे हैं। इस चुनाव में अगर वो मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाए तो 2030 के चुनाव तक उनके लिए वोट और जगह दोनों सिमटेंगे। ऐसा क्यों हो रहा है, इसका कोई एक जवाब फिलहाल नहीं दिखता।
असदुद्दीन ओवैसी क्यों महागठबंधन में आने के लिए हैं परेशान?
ओवैसी अपनी पार्टी एआईएमआईएम को राष्ट्रीय पार्टी के दर्जा तक ले जाना चाहते हैं इसलिए वो कई राज्यों में चुनाव लड़ते हैं। कहीं जीत जाते हैं, कहीं जीतकर अगली बार हार जाते हैं। यह सिलसिला विधानसभा स्तर पर आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार और महाराष्ट्र से आगे नहीं बढ़ पा रहा है। लोकसभा में हैदराबाद के अलावा उन्हें एक बार महाराष्ट्र से एक सांसद मिला है। कुछ राज्यों के नगर निकाय चुनावों में उन्हें थोड़ी सफलता मिली है, जिसमें उत्तर प्रदेश शामिल है।
बिहार में इस बार एनडीए के साथ उनके 2020 के पार्टनर उपेंद्र कुशवाहा तो हैं ही, साथ में वो चिराग पासवान भी हैं, जो 2020 में 134 सीटों पर मुख्य रूप से जेडीयू और कुछ पर भाजपा व बाकी दलों से लड़ गए थे। इस बार सब नीतीश और भाजपा के साथ हैं। एनडीए 2020 से बहुत ज्यादा मजबूत दिख रहा है। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी की सभाओं में भी मुस्लिम जुट रहे हैं। सरकार हटाने और सरकार बनाने की लड़ाई में महागठबंधन मुसलमान और सेकुलर वोटरों की स्वाभाविक पसंद बन सकता है। ऐसे में ओवैसी के लिए 2025 की लड़ाई 2020 जैसी नहीं है।
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पहलगाम में आतंकी हमले के बाद नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा विदेश दौरे पर भेजे गए सांसदों के प्रतिनिधिमंडल में शामिल रहे ओवैसी ने पाकिस्तान को भिंगो-भिंगोकर धोया है। डेलिगेशन में गए कांग्रेसी सांसदों को पार्टी से कोई तारीफ नहीं मिली। ऐसा माहौल बनाया गया कि देश का पक्ष रखने गए विरोधी दलों के सांसदों को भाजपा के मददगार की तरह पेश किया जा रहा है। पहलगाम हमले के बाद ओवैसी उन लोगों को भी पसंद आ रहे हैं, जो उनके नाम भर से बिदक जाते थे। ओवैसी के कोर वोटर इन नए-नवेले फैन से विपरीत वोट करते हैं।
राजद, कांग्रेस, लेफ्ट और वीआईपी के महागठबंधन में एंट्री मिलने से ओवैसी के एक साथ दो काम हो जाते। एक तो बीजेपी की बी टीम कहने वाले दलों के साथ गठबंधन से ओवैसी के कोर वोटर में कन्फ्यूजन कम होता। दूसरा पांच सीट भी मिलती तो उस पर जीतने के आसार प्रबल हो जाते। 2020 में एआईएमआईएम ने किशनगंज और पूर्णिया जिले की 2-2 और अररिया की 1 सीट जीती थी। ईमान के अलावा बाकी सब राजद में चले गए। महागठबंधन का साथ मिलता है तो पार्टी में टूट-फूट का खतरा कम होता।
महागठबंधन में ओवैसी का रास्ता क्यों रोक रहे लालू और तेजस्वी यादव?
सेकुलर वोटों का बंटवारा रोकने की दलील दे रही ओवैसी की पार्टी की खुली अपील और चिट्ठी को लालू और तेजस्वी बहुत भाव नहीं दे रहे। एक महीने से अख्तरुल ईमान गठबंधन करने का गाना गा रहे हैं लेकिन राजद को धुन पसंद नहीं आ रही। और अब राजद सांसद मनोज झा यह कह रहे हैं कि अगर भाजपा को हराने में ओवैसी को हमारी मदद करनी है तो वो बिहार चुनाव ही ना लड़ें। इसका मतलब है कि लालू-तेजस्वी एक भी सीट ओवैसी को नहीं देना चाहते हैं।
इसकी एक वजह तो यह भी हो सकती है कि महागठबंधन के मौजूदा दलों में ही सीट शेयरिंग को लेकर बात नहीं बन पा रही है। उसमें 50 सीट की तैयारी जैसे बयान देकर आ रही ओवैसी की पार्टी को लेकर सीट बंटवारा और सिरदर्द हो जाएगा। 243 सीट में कांग्रेस और वीआईपी 50 से ऊपर सीट मांग रही है। 16 सीटों वाले लेफ्ट फ्रंट की तीन पार्टियां भी 50 सीट मांग रही हैं। तेजस्वी भी राजद को 130-140 सीट लड़ाना चाहते हैं। जैसे एनडीए की नजर मुकेश सहनी पर है, वैसे ही महागठबंधन की उपेंद्र कुशवाहा पर है। इतनी मगजमारी के बीच ओवैसी ने एंट्री मारी तो AIMIM के लिए सीट एडजस्ट करने में कोई और छिटक सकता है।
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दूसरी वजह, बिहार में मुस्लिम और यादव वोट पर लंबे समय से लालू यादव वाले गठबंधन का दावा रहा है। 2020 में ओवैसी को 5 सीटें सीमांचल के तीन जिलों से मिली। बाकी जगह तेजस्वी का प्रभाव दिखा और राजद 75 सीट के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। AIMIM के चार विधायकों को राजद में लाने के बाद ओवैसी के प्रभाव क्षेत्र में तेजस्वी 2020 से ज्यादा आश्वस्त लग रहे हैं। ओवैसी को साथ लाने में तेजस्वी को यह खतरा भी दिख रहा है कि इससे एआईएमआईएम को बिहार में पांव मजबूत करने का मौका मिल सकता है जो राजद की कीमत पर ही होगा। वो इस रिस्क के लिए तैयार नहीं हैं।
बिहार में वामपंथी दलों के पतन की कहानी तेजस्वी के लिए एक सबक है। लालू यादव के साथ गठबंधन में लड़ने के बाद अलग होने पर कम्युनिस्ट पार्टियों के काफी वोटर लालू के साथ रह गए। जो वोटर पहले अमीर-गरीब, भूमिहीन-जमींदार जैसी बातों से वर्ग (क्लास) की राजनीति करने वाले लेफ्ट को वोट देता था वो गठबंधन के दौरान लालू के प्रभाव में समाजवादी हो गए। लालू के बेटे ओवैसी को वो मौका नहीं देना चाहते कि साथ लेकर उन्हें मजबूत किया जाए और बाद में वो उनके माय समीकरण का एम लेकर निकल ले





