
कभी वोट देने पर सजा मिलती थी, अब टाइट होकर मतदान करते हैं; कैसे बदली जहानाबाद की सूरत
संक्षेप: Bihar Elections: 90 के दशक तक जहानाबाद में नक्सलियों के द्वारा प्रत्येक चुनाव में वोट बहिष्कार की घोषणा की जाती थी। कुछ लोग साहस कर वोट देने जाते थे। अगर किसी ने वोट दे दिया और बाद में नक्सलियों को पता चल गया तो उन्हे दंडित किया जाता था।
Bihar Elections: बिहार के जहानाबाद रेलवे स्टेशन से दस किलोमीटर दूर सदर प्रखंड का सिकरिया गांव। यह गांव कभी ‘नक्सलवाद का गढ़’ के रूप में चर्चित था। यहां प्रशासन की नहीं, नक्सलियों का कानून चलता था। भाकपा माओवादी और पीपुल्स वार वोट बहिष्कार का नारा देते थे। जिसने मतदान किया, उसे सजा मिलती थी। माफी मांगनी पड़ती थी और जुर्माने के रूप में उठक-बैठक करनी पड़ती थी।

बुजुर्ग रामजी प्रसाद बताते हैं कि 90 के दशक तक यहां नक्सलियों के द्वारा प्रत्येक चुनाव में वोट बहिष्कार की घोषणा की जाती थी। कुछ लोग साहस कर वोट देने जाते थे। अगर किसी ने वोट दे दिया और बाद में नक्सलियों को पता चल गया तो उन्हे दंडित किया जाता था। अब यह अतीत की बात हो चुकी है।
सिकरिया अब बदल चुका है। यहां सामुदायिक शेड में जीविका से जुड़ी 20- 25 महिलाएं जुटी हुई हैं। पैसे के लेन-देन का हिसाब-किताब कर रही हैं। उन्हीं में से एक सुमित्रा देवी कहती हैं कि ‘अब कुछ डर-भय नहीं लगता है। अब टाइट होकर वोट देने जाते हैं। पहले हिंसा और गोली चलने का डर था। वोट देने जाने से रोका जाता था। छिप-छिपकर सिर्फ कुछ बुजुर्ग महिलाएं वोट देने जाती थीं। लेकिन 2005 के बाद स्थितियां बदली है। अब नई बहुएं भी वोट देने जाती हैं।’
अस्सी से नब्बे के बीच करीब 40 लोगों की हत्या
जहानाबाद जिले में 11 नवंबर को मतदान होने वाला है। मतदान को लेकर पुरुष से अधिक उत्साह महिलाओं में दिख रही है। नक्सलियों का गढ़ रहा सिकरिया गांव अब औद्योगिक हब के रूप में विकसित हो रहा है। हिंसा-प्रतिहिंसा के दौर में अस्सी से नब्बे के बीच करीब 40 लोगों की हत्याएं हुई थीं। लेकिन अब यहां लोगों में किसी बात का डर या भय नहीं है। लोग खुली हवा में सांस ले रहे हैं और अमन-चैन से रह रहे हैं। आज सिकरिया मॉडल सूबे में एक नजीर पेश कर रहा है।
कामदेव बिगहा–सिकरिया सड़क से जैसे ही सिकरिया थाना क्षेत्र की सीमा शुरू होती है, बड़े-बड़े औद्योगिक इकाइयों की इमारतें दिखाई देने लगती हैं। गांव में प्रवेश करने से पहले ही विशाल फैक्ट्री नजर आती है। इसके करीब दो सौ मीटर की दूरी पर आधा दर्जन पोल्ट्री हैचरी हैं, जहां मुर्गियों के अंडों से चूजे तैयार किए जाते हैं। यहां तैयार चूजे बिहार से बाहर भी भेजे जा रहे हैं। वहीं एक बड़ा ऑटोमेटिक राइस मिल भी संचालित है। इन औद्योगिक इकाइयों में सैकड़ों लोगों को रोजगार मिला हुआ है। गांव में 11 किराना दुकानें, चार मेडिकल दुकानें, और गिट्टी-छड़, सीमेंट से लेकर हर जरूरी सामान उपलब्ध है।
ग्रामीण रामाश्रय पासवान बताते हैं- पहले मामूली विवाद में ही हत्या और गोलीबारी हो जाती थी, लेकिन अब गांव की दशा बदल गई है। वर्ष 2006 में सिकरिया गांव में ‘आपकी सरकार, आपके द्वार’ कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी। इसके तहत गांव में सड़क और बिजली पहुंची। इसका असर अब दिख रहा है।
घर से निकलने की हिम्मत नहीं थी
सिकरिया पुस्तकालय स्थित बूथ नंबर 173 के पास समोसे और नमकीन की दुकान पर बैठे 70 वर्षीय बुजुर्ग संत प्रसाद सिंह कहते हैं- अस्सी के दशक में इसी गांव से खूनी संघर्ष की कहानी शुरू हुई थी, जिसकी चपेट में जिले का पूरा पश्चिमी इलाका आ गया था। हिंसा-प्रतिहिंसा में सिर्फ सिकरिया गांव में ही 35–40 लोगों की हत्याएं हुई थीं। लोग आतंक के साये में रहते थे। दिन में भी घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं करते थे। बच्चे स्कूल पढ़ने जाते या बड़े लोग खेत में काम करने जाते, तो महिलाएं चिंता में रहती थीं। दिन के उजाले में भी नक्सली हथियार लेकर घूमते थे। गांव के अधिकांश लोग खेती-बारी पर निर्भर हैं। लोगों के घरों के आगे एक-दो दुधारू पशु बंधे दिखाई देते हैं। इस बार धान की अच्छी फसल हुई है, हालांकि बारिश के कारण धान कटाई का काम बाधित हुआ है।
2005 के पहले गांव में कुछ नहीं था
पहले गांव तक पहुंचना मुश्किल था। अब दो तरफ से सड़कें हैं। आवागमन की सुविधा मिलने के कारण चहल-पहल बढ़ी है। करीब 1980 में, इस गांव में पुलिस कैंप था, लेकिन घटनाओं के कई घंटे बाद ही पुलिस पहुंचती थी। अगर रात में हत्या हो जाती, तो पुलिस सुबह होने का इंतजार करती थी। चूहड़मल गली मोड़ के समीप आहर पर बैठे सेवानिवृत्त कर्मी भीम सिंह बताते हैं कि 2005 के पहले गांव में कुछ नहीं था। कच्ची सड़क थी, जिसके सहारे लोग कड़ौना तक जाते थे।





